बिहार की जाति गणना रिपोर्ट आने के साथ गरमाई सियासत आगे चलकर केंद्रीय राजनीति में बड़े बदलाव की ओर इशारा करती है। कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने जिस प्रकार ओबीसी केंद्रित सामाजिक न्याय की लाइन पकड़ी है, उससे आगामी लोकसभा चुनाव के दौरान पिछड़ी जाति से जुड़े मुद्दों का ही केंद्र में रहना लगभग तय हो गया है। माना जा रहा है कि अब केंद्रीय स्तर पर जाति गणना कराने, जातियों की आबादी के हिसाब से नीतियां बनाने और समुचित अनुपात में सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी देने की मांग और तेजी होगी। भाजपा पर फौरी तौर पर केंद्रीय स्तर पर जाति गणना कराने का दबाव बढ़ना तय है।
इस रणनीति पर विपक्ष
भाजपा शासनकाल में कई मोर्चों पर मात खा चुका विपक्ष अगले लोकसभा चुनाव में उसे सामाजिक न्याय की पिच पर घेरना चाहता है। बिहार में अलग से जाति गणना इसी रणनीति का हिस्सा है। दूसरी ओर, कांग्रेस अगड़े मतदाताओं का मोह छोड़कर इसी रणनीति के तहत केंद्रीय स्तर पर जाति गणना, महिला आरक्षण में ओबीसी महिलाओं के लिए कोटा तो यूपी में सपा पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक (पीडीए) पर दांव लगा रही है।
मजबूत पैठ बना चुकी भाजपा की रणनीति-देखो और इंतजार करो
दरअसल, 2021 में कोरोना महामारी के कारण गणना नहीं हो पाई। हालांकि, मोदी सरकार ने तब साफ कर दिया था कि वह जनगणना में अलग से जाति की गणना नहीं कराएगी, लेकिन अब बिहार की रिपोर्ट सामने आने के बाद पार्टी पर इस मामले में अपना रुख साफ करने का दबाव होगा। बहरहाल, बीते करीब 10 सालों में अगड़ों की पार्टी का तमगा हटाकर अति पिछड़ी जातियों में मजबूत पैठ बना चुकी भाजपा फिलहाल देखो और इंतजार करो के मूड में है। ओबीसी पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए पार्टी ने नवंबर महीने में प्रयागराज में ओबीसी महाकुंभ बुलाने की घोषणा की है। इसके अलावा पार्टी के पास गैर-रसूखदार ओबीसी जातियों को साधने के लिए रोहिणी आयोग की रिपोर्ट के तौर पर एक बड़ा हथियार भी है।
भाजपा की बढ़ेगी चुनौती
2014 के चुनाव में पहली बार भाजपा को पीएम मोदी के तौर पर ओबीसी के मजबूत चेहरे का व्यापक लाभ मिला। इसके जरिये भाजपा रसूख वाली ओबीसी जातियों के मुकाबले अति पिछड़ा ओबीसी में मजबूत पैठ बनाने में कामयाब हुई। 1996 में भाजपा को अति पिछड़ी जातियों के महज 17 फीसदी वोट मिले थे, जो 2014 में 43 फीसदी और 2019 में 48 फीसदी हो गए। अगर केंद्रीय स्तर पर जाति गणना समेत ओबीसी के दूसरे मुद्दे केंद्र में आए तो भाजपा को इससे बाहर निकलने के लिए बड़ी मशक्कत करनी होगी।
ओबीसी महाकुंभ में अहम घोषणा
भाजपा सूत्रों का कहना है कि नवंबर में प्रयागराज में ओबीसी महाकुंभ प्रस्तावित है। इसमें पार्टी कुछ अहम घोषणाएं कर सकती है। पार्टी का कहना है कि मोदी सरकार के आने के बाद ओबीसी से जुड़े कई काम हुए हैं। ओबीसी आयोग को सांविधानिक दर्जा, नीट में ओबीसी आरक्षण इसी सरकार की देन है। पहली बार ओबीसी में शामिल कमजोर जातियों को सरकारी नीतियों, योजनाओं और कार्यक्रमों का लाभ मिला है। सरकार में हिस्सेदारी बढ़ी है। ऐसे में ओबीसी में भाजपा की पैठ कमजोर करना आसान नहीं होगा।