ज्यादा आबादी पर लगे ज्यादा टैक्स
सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे पर जबरदस्त बहस चल रही है। एक सोशल मीडिया उपभोक्ता हिमांशु नारायण ने प्रश्न किया है कि क्या ज्यादा आबादी वालों को ज्यादा टैक्स नहीं देना चाहिए? अल्पसंख्यक समुदाय अपने टैक्स से बहुसंख्यक समुदाय को मिलने वाली कल्याणकारी योजनाओं का भार क्यों उठाये? उन्होंने कहा है कि ज्यादा संख्या वाले लोगों को ज्यादा हिस्सेदारी देने से लोगों में जनसंख्या बढाने का ही विचार पैदा होगा जिसे भारत जैसे देश बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं है।
'मुझसे नहीं पूछी मेरी जाति'
राजकिशोर सिन्हा ने प्रश्न किया है कि उनसे आजतक किसी ने उनकी जाति नहीं पूछी। ऐसे में इस बात की क्या गारंटी है कि जो जातिगत जनगणना जारी की गई है, वह सही है। उन्होंने कहा है कि जिन लोगों ने अंतरजातीय विवाह किया है, या जिन्होंने अपनी जातियां छिपा लिया है, उन्हें किस जाति और किस श्रेणी में रखा गया है। सिन्हा का प्रश्न है कि सरकार ने आर्थिक आधार पर लोगों का आंकड़ा क्यों जारी नहीं किया।
'हिंदुओं को जातियों में बांटने की कोशिश'
चंद्रप्रकाश दुबे ने कहा है कि केवल जातिगत जनगणना ही नहीं जारी करनी चाहिए। यह भी बताना चाहिए कि किस जाति के कितने प्रतिशत लोग टैक्स देते हैं। अपराधियों में जातियों का प्रतिशत क्या है। प्रश्न यह भी किया जा रहा है कि जब जातिगत आधार पर ही अधिकारियों का चयन होगा तो क्या मामलों की जांच करते समय वह जातिगत आधार पर प्रभावित नहीं हो सकती है। क्या अपराधी भी यह मांग कर सकेंगे कि उनके मामले की जांच किस जाति का अधिकारी करे और किस जाति का नहीं। लोग इसे हिंदुओं को जातियों के आधार पर बांटने की कोशिश के तौर पर भी देख रहे हैं।
जन्म से श्रेष्ठ नहीं तो जन्म से पिछड़ा कैसे?
लेखराज मीणा ने लखनऊ के किसी महाविद्यालय के प्रिंसिपल की लिस्ट साझा किया है। लिस्ट में सभी तथाकथित उच्च जातियों के लोग प्रिंसिपल की लिस्ट में शामिल हैं। लेखराज का कहना है कि ये एक लिस्ट ही यह बताने के लिए पर्याप्त है कि जातिगत जनगणना और उसके आधार पर मिलने वाला आरक्षण क्यों आवश्यक है। वहीं, रत्न वीरेंद्र सिंह ने लिखा है कि यदि जन्म के आधार पर कोई श्रेष्ठ नहीं हो सकता तो जन्म के आधार पर किसी को निचले वर्ग का या पिछड़ा हुआ कैसे माना जा सकता है।
वैज्ञानिक प्रतिभा कैसे मिलेगी?
सोशल मीडिया पर यूजर हर वर्ग, हर जाति और हर धर्म के गरीब लोगों को शिक्षा और कल्याणकारी योजनाओं का लाभ देने का समर्थन कर रहे हैं, लेकिन उनका कहना है कि जाति के आधार पर कम योग्य व्यक्ति को ऐसे पद पर नहीं बिठाया जाना चाहिए जिसके लिए वह योग्य न हो। कुछ सोशल मीडिया पोस्ट में समाचार पत्रों की कतरनों को साझा करते हुए कहा गया है कि न्यूनतम अंक न पाने वाले व्यक्ति को भी शिक्षक या डॉक्टर बनाया जाएगा तो क्या यह देश की शिक्षा व्यवस्था और लोगों के जीवन से खिलवाड़ नहीं होगा? यदि योग्यता की बजाय हम जातियों को प्राथमिकता देंगे तो हमें वो वैज्ञानिक प्रतिभा कहाँ से मिलेगी जो देश को दुनिया में सर्वश्रेष्ठ बनाने में मदद करेगी?