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Justice Verma: जस्टिस वर्मा के पास महाभियोग से बचने का है एक ही रास्ता, जानिए क्या है पद से हटाने की प्रक्रिया

Sun, 08 Jun 2025 01:56 PM IST
नितिन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

मार्च में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में न्यायमूर्ति वर्मा के आवास पर आग लगने की घटना हुई थी। उस वक्त जस्टिस वर्मा दिल्ली उच्च न्यायालय में न्यायाधीश थे। आग के दौरान जस्टिस वर्मा के आवास के आउटहाउस में नकदी की कई जली हुई बोरियां मिलीं थीं।
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जस्टिस यशवंत वर्मा - फोटो : PTI
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विस्तार
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नकदी बरामदगी मामले में फंसे जस्टिस यशवंत वर्मा के पास संसद द्वारा लाए जाने वाले महाभियोग से बचने के लिए इस्तीफा देने का ही एकमात्र विकल्प बचा है। सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति और उन्हें पद से हटाने की प्रक्रिया के जानकार अधिकारियों ने बताया कि किसी भी सदन में सांसदों के समक्ष अपना पक्ष रखते हुए जस्टिस वर्मा इस्तीफे की घोषणा कर सकते हैं और उनके मौखिक बयान को ही उनका इस्तीफा माना लिया जाएगा।
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इस्तीफा दिया तो मिलेंगे पेंशन और अन्य लाभ
अधिकारियों ने बताया कि अगर जस्टिस वर्मा इस्तीफा देने का फैसला करते हैं, तो उन्हें सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान पेंशन और अन्य लाभ मिलेंगे। लेकिन अगर उन्हें संसद द्वारा हटाया जाता है, तो उन्हें पेंशन और अन्य लाभ नहीं मिल सकेंगे। संविधान के अनुच्छेद 217 के अनुसार, उच्च न्यायालय का न्यायाधीश राष्ट्रपति को संबोधित करते हुए अपने हस्ताक्षर सहित लिखित रूप में अपना पद त्याग सकता है। इसके लिए किसी अनुमोदन की जरूरत नहीं है।

उल्लेखनीय है कि मार्च में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में न्यायमूर्ति वर्मा के आवास पर आग लगने की घटना हुई थी। उस वक्त जस्टिस वर्मा दिल्ली उच्च न्यायालय में न्यायाधीश थे। आग के दौरान जस्टिस वर्मा के आवास के आउटहाउस में नकदी की कई जली हुई बोरियां मिलीं थीं। हालांकि जस्टिस वर्मा ने नकदी के बारे में अनभिज्ञता का दावा किया, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त जांच समिति ने कई गवाहों से बात करने और उनके बयान दर्ज करने के बाद जस्टिस यशवंत वर्मा को दोषी ठहराया था। जस्टिस वर्मा को सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें उनके मूल उच्च न्यायालय, इलाहाबाद उच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया है, जहां उन्हें कोई न्यायिक कार्य नहीं सौंपा गया है।
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जस्टिस खन्ना ने इस्तीफा देने को कहा था
पूर्व सीजेआई संजीव खन्ना ने जस्टिस वर्मा मामले की जांच के लिए तीन न्यायाधीशों की एक समिति गठित की, जिसने अपने रिपोर्ट में जस्टिस वर्मा को दोषी माना। जांच रिपोर्ट मिलने के बाद पूर्व मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर न्यायमूर्ति वर्मा को हटाने के लिए कहा था। जस्टिस खन्ना ने वर्मा को इस्तीफा देने के लिए कहा था, लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जस्टिस वर्मा ने इनकार कर दिया था।  

क्या है संसद द्वारा हटाने की प्रक्रिया
संसद के दोनों सदनों में से किसी में भी जस्टिस वर्मा के खिलाफ प्रस्ताव लाया जा सकता है। राज्यसभा में कम से कम 50 सदस्यों को प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने होते हैं। लोकसभा में 100 सदस्यों को इसका समर्थन करना जरूरी है। न्यायाधीश (जांच) अधिनियम 1968 के अनुसार, जब किसी न्यायाधीश को हटाने का प्रस्ताव किसी भी सदन में स्वीकार कर लिया जाता है, तो अध्यक्ष एक तीन सदस्यीय समिति का गठन करेंगे, जो उन आधारों की जांच करेगी, जिनके आधार पर आरोपी जज को हटाने (या महाभियोग) की मांग की गई है।

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संसद द्वारा गठित समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) या सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश, 25 उच्च न्यायालयों में से किसी एक के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित न्यायविद शामिल होते हैं। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने पिछले सप्ताह कहा था कि जस्टिस वर्मा का मामला इस मामले में थोड़ा अलग है, क्योंकि तत्कालीन सीजेआई खन्ना द्वारा गठित एक आंतरिक समिति पहले ही रिपोर्ट पेश कर चुकी है, जिसमें जस्टिस वर्मा को भ्रष्टाचार का दोषी माना गया है। सरकार अब इस पर विचार कर रही है कि इस स्थिति में क्या किया जाएगा। रिजिजू ने कहा कि इस मामले में स्पीकर फैसला लेंगे।

इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश वी रामास्वामी और कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सौमित्र सेन को पहले महाभियोग की कार्यवाही का सामना करना पड़ा था, लेकिन उन्होंने महाभियोग से पहले ही इस्तीफा दे दिया था। न्यायमूर्ति वर्मा को हटाने की कार्यवाही संसद के आगामी मानसून सत्र में की जाएगी। मानसून सत्र 21 जुलाई से शुरू होकर 12 अगस्त को समाप्त होगा। यह नए संसद भवन में की जाने वाली पहली महाभियोग कार्यवाही होगी।

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