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Supreme Court: अदालत ने जस्टिस वर्मा से पूछा- पहले कोर्ट क्यों नहीं आए? 'नकदी विवाद' पर अब 30 जुलाई को सुनवाई

Mon, 28 Jul 2025 02:04 PM IST
शिव शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

नकदी विवाद पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस वर्मा से कई तीखे सवाल पूछे। साथ ही कोर्ट ने जांच समिति में शामिल होने को लेकर और पहले ही कोर्ट न आने पर सवाल खड़ा किया। बता दें, याचिका में आंतरिक जांच समिति की रिपोर्ट को खारिज करने और देश के तत्कालीन चीफ जस्टिस संजीव खन्ना की 8 मई की सिफारिश रद्द करने का अनुरोध किया गया था।
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जस्टिस यशवंत वर्मा केस। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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नकदी मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को सुनवाई हुई। जस्टिस वर्मा ने अपनी याचिका में आंतरिक जांच समिति की उस रिपोर्ट को अमान्य घोषित करने की अपील की है, जिसमें उन्हें नकदी बरामदगी विवाद में कदाचार का दोषी पाया गया है। इस सुनवाई को करते हुए जज ने कई गंभीर सवाल खड़े किए। 

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सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और एजी मसीह की पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल से सवाल किया, जो याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए थे। कोर्ट ने पूछा कि आप पहले जांच समिति के सामने पेश क्यों हुए? क्या आप कोर्ट आए थे यह कहने कि वीडियो हटाया जाए? आपने जांच पूरी होने और रिपोर्ट जारी होने तक इंतजार क्यों किया? क्या आपने पहले वहां से अनुकूल आदेश पाने की उम्मीद की थी?

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर उठाए ये सवाल
पीठ ने यह भी कहा कि याचिका दाखिल करते समय जस्टिस वर्मा को जांच रिपोर्ट भी साथ लगानी चाहिए थी। कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि याचिका में जिन पक्षों को शामिल किया गया है, वो सही तरीके से तय नहीं किए गए हैं। कोर्ट ने सिब्बल से कहा कि वे एक पेज का बुलेट पॉइंट सारांश तैयार करें और 'मेमो ऑफ पार्टीज' ठीक करें। वहीं, सिब्बल ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 124 के तहत एक न्यायाधीश को सार्वजनिक बहस का विषय नहीं बनाया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर वीडियो का सार्वजनिक होना, मीडिया में बहस और जनता में हंगामा न्यायपालिका की गरिमा के खिलाफ है।

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जस्टिस वर्मा ने सिफारिश रद्द करने का किया अनुरोध
दिल्ली में उनके सरकारी आवास से भारी मात्रा में जली हुई नकदी बरामद की गई थी। इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक आंतरिक समिति का गठन किया था, जिसने मामले की जांच की थी। जांच में उनके खिलाफ मजबूत सबूत पाए गए थे और उनके खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही की सिफारिश की गई थी। इस मामले में बीते 18 जुलाई को जस्टिस वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी याचिका दाखिल की थी और जांच समिति की रिपोर्ट को खारिज करने और देश तत्कालीन चीफ जस्टिस संजीव खन्ना की 8 मई की सिफारिश रद्द करने का अनुरोध किया था।

'निष्कर्ष पहले से ही कल्पना की गई कहानी पर आधारित थे'
अपनी याचिका में न्यायमूर्ति वर्मा ने दलील दी है कि जांच गंभीरता से नहीं गई। ऐसे में उन्हें अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच करने और उन्हें गलत साबित करने की आवश्यकता हुई। उन्होंने आरोप लगाया कि पैनल के निष्कर्ष पहले से ही कल्पना की गई कहानी पर आधारित थे। न्यायमूर्ति वर्मा ने कहा कि जांच की समय-सीमा केवल प्रक्रियात्मक निष्पक्षता की कीमत पर और कार्यवाही को जल्द से जल्द से समाप्त करने की इच्छा से प्रेरित थी।

याचिका में क्या तर्क दिया गया?
याचिका में तर्क दिया गया है कि जांच पैनल ने उन्हें पूरी और निष्पक्ष सुनवाई का अवसर दिए बिना ही फैसला सुना दिया। याचिका को अभी सुनवाई के लिए किसी पीठ के सामने सूचीबद्ध किया जाना है। घटना की जांच कर रहे पैनल की रिपोर्ट में कहा गया था कि न्यायमूर्ति वर्मा और उनके परिवार के सदस्यों का उस स्टोर रूम पर नियंत्रण था, जहां से भारी मात्रा में अधजली नकदी मिली थी। इससे उनके कदाचार का सबूत मिलता है, जो इतना गंभीर है कि उन्हें हटाया जाना चाहिए।
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तीन न्यायाधीशों के पैनल ने जांच की थी
पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश शील नागू की अध्यक्षता वाले तीन न्यायाधीशों के पैनल ने 10 दिनों तक जांच की। इस दौरान 55 गवाहों से पूछताछ की गई और 14 मार्च की रात लगभग 11.35 बजे न्यायमूर्ति वर्मा के आधिकारिक आवास पर लगी आकस्मिक आग वाले घटनास्थल का दौरा किया। जस्टिस वर्मा उस समय दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे और अब इलाहाबाद उच्च न्यायालय में कार्यरत हैं।

महाभियोग चलाने की सिफारिश की थी
इस रिपोर्ट पर कार्रवाई करते हुए भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश खन्ना ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग चलाने की सिफारिश की थी।
 
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