तो ये है इनसाइड स्टोरी
बल के पूर्व अफसर बताते हैं कि अधिकांश जवानों को घर की परेशानी नहीं है। दो-चार जवानों के साथ ऐसा संभव है। ये अलग बात है कि आत्महत्या के मामलों के पीछे संबंधित बल और केंद्रीय गृह मंत्रालय, जवानों की निजी समस्या को ही एक प्रमुख कारण मानते हैं। पूर्व अधिकारी कहते हैं कि सरकार इस मामले में झूठ बोल रही है कि आत्महत्या के पीछे घरेलू वजह होती है। इन्हें ड्यूटी पर क्या परेशानी है, इस बारे में सरकार कोई बात नहीं करती। आतंक, नक्सल, चुनावी ड्यूटी, आपदा, वीआईपी सिक्योरिटी और अन्य मोर्चों पर इन बलों के जवान तैनात हैं। इसके बावजूद उन्हें सिविल फोर्स बता दिया जाता है। जवानों को पुरानी पेंशन से वंचित रखा जा रहा है। सिपाही से लेकर कैडर अफसरों तक की प्रमोशन में लंबा वक्त लग रहा है। केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को भारतीय सेना के बराबर शहीद का दर्जा नहीं दिया जाता। जवानों के राशन में भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहते हैं।
समस्या की ठीक तरह से सुनवाई नहीं हो पाती
बीएसएफ के पूर्व एडीजी संजीव कृष्ण सूद कहते हैं, सीएपीएफ में कई जगहों पर वर्कलोड ज्यादा है। एक कंपनी में जवानों की तय संख्या कभी भी पूरी नहीं रहती। मुश्किल से साठ सत्तर जवान ही ड्यूटी पर रहते हैं। ऐसे में उनके ड्यूटी के घंटे बढ़ जाते हैं। जवान ठीक से सो नहीं पाते हैं। वे अपनी समस्या किसी के सामने रखते हैं, तो वहां ठीक तरह से सुनवाई नहीं हो पाती। ये बातें जवानों को तनाव की ओर ले जाती हैं। कुछ स्थानों पर बैरक एवं दूसरी सुविधाओं की कमी नजर आती है। कई दफा सीनियर की डांट फटकार भी जवान को आत्महत्या तक ले जाती है। समय पर प्रमोशन या रैंक न मिलना भी जवानों को तनाव देता है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 2019 में सीएपीएफ जवानों को एक साल में 100 दिन की छुटी देने की घोषणा की थी। अभी तक किसी भी बल में यह योजना लागू नहीं हो सकी है। जवानों और अफसरों द्वारा बड़ी संख्या में नौकरी छोड़ने के पीछे भी यही कारण जिम्मेदार हैं।
कार्यबल की रिपोर्ट तैयार हो रही है
साल 2011 से लेकर अब तक केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के 1532 जवानों ने आत्महत्या कर ली है। अगर किसी प्राकृतिक आपदा या दुश्मन के हमले में जवान हताहत हों तो समझ आता है। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय के मुताबिक, इन बलों में आत्महत्याओं और भ्रातृहत्याओं को रोकने के लिए जोखिम के प्रासंगिक घटकों एवं प्रासंगिक जोखिम समूहों की पहचान करने तथा उपचारात्मक उपायों से संबंधित सुझाव देने के लिए एक कार्यबल का गठन किया गया है। कार्यबल की रिपोर्ट तैयार हो रही है। सीएपीएफ में तबादले और छुट्टी को लेकर पारदर्शी नीतियां बनाई जा रही हैं। कठिन क्षेत्रों में सेवा करने के पश्चात यथासंभव उसकी पसंदीदा तैनाती पर विचार किया जाता है।
जवानों के साथ नियमित संवाद का दावा
जवानों की शिकायतों का पता लगाने के लिए और उनका निराकरण करने के मकसद से अधिकारियों के साथ नियमित संवाद होता है। बेहतर चिकित्सा सुविधाएं प्रदान की जाती हैं। उनकी व्यक्तिगत एवं मनोवैज्ञानिक चिंता के निवारण के लिए विशेषज्ञों के साथ बातचीत का आयोजन होता है। बेहतर पहचान तथा समाज में सम्मान देने के लिए सेवानिवृत्त सीएपीएफ कार्मिकों को पूर्व सीएपीएफ कार्मिक का नाम दिया जाता है। अगर कोई ड्यूटी पर घायल होता है तो अस्पताल में बितायी गई अवधि, ड्यूटी की अवधि मानी जाती है। रहन सहन, मनोरंजन व खेल की सुविधाएं मुहैया कराई गई हैं। जवानों के बच्चों को छात्रवृत्ति सहित विभिन्न कल्याणकारी योजनाएं शुरू की गई हैं। जब कभी रिक्तियां उत्पन्न होती हैं तो पात्र कर्मियों को नियमित रूप से पदोन्नति दी जाती है। 10, 20 व 30 साल की सेवा पूरी होने के बाद एमएसपी के तहत वित्तीय लाभ प्रदान किए जाते हैं।