केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) के अधिकारियों के एक समूह ने गृह मंत्री अमित शाह से सीएपीएफ (सामान्य प्रशासन) विधेयक, 2026 पर पुनर्विचार करने की अपील की है। उनका कहना है कि यह विधेयक उन्हें संगठन में दोयम दर्जे का नागरिक बना देगा, जिसकी सेवा वे वर्षों से कर रहे हैं।
अधिकारियों का तर्क है कि यह विधेयक एक ग्लास सीलिंग को मजबूत करता है, जिसमें शीर्ष नेतृत्व की भूमिकाएं भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के प्रतिनियुक्ति पर आए अधिकारियों के लिए आरक्षित हैं। इससे कैडर अधिकारियों को स्थायी रूप से अपने संगठनों का नेतृत्व करने से रोका जाएगा।
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शौर्य चक्र से सम्मानित अधिकारी समेत कई ने लिखा पत्र
पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, इस संबंध में 2011-2016 बैच के कुछ अधिकारियों द्वारा लिखे गए एक-एक पृष्ठ के पत्रों को देखा गया है। ऐसे ही एक पत्र सीआरपीएफ के सहायक कमांडेंट बिभोर कुमार सिंह का है, जिन्हें 2022 में बिहार में एक नक्सल विरोधी अभियान के दौरान असाधारण बहादुरी दिखाने के लिए देश का तीसरा सबसे बड़ा शांति काल वीरता पुरस्कार, शौर्य चक्र प्राप्त हुआ था।
विधेयक का उद्देश्य और वर्तमान स्थिति
गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने पिछले सप्ताह संसद में सीएपीएफ (सामान्य प्रशासन) विधेयक, 2026 पेश किया था। यह विधेयक गृह मंत्रालय के अधीन पांच केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों- सीआरपीएफ, बीएसएफ, आईटीबीपी, एसएसबी और सीआईएसएफ को नियंत्रित करेगा। इन बलों की संयुक्त क्षमता लगभग 10 लाख है और इन्हें विभिन्न कानून-व्यवस्था, सीमा सुरक्षा, आतंकवाद-नक्सलवाद विरोधी अभियानों और चुनावों जैसे आंतरिक सुरक्षा कार्यों के लिए तैनात किया जाता है।
किन प्रावधानों पर जताई आपत्ति?
अधिकारियों ने अपने पत्रों में कहा है कि विधेयक के प्रावधान अत्याचारी हैं। उन्होंने कहा कि अगर प्रतिनियुक्ति और प्रशासनिक संरक्षण को विशेषज्ञता और क्षेत्रीय अनुभव पर प्राथमिकता दी जाती है, तो उनके लिए आत्म-सम्मान के साथ सेवा जारी रखना असंभव होगा। उन्होंने विधेयक के पारित होने से पहले इस पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया है।
मनोबल पर असर और वित्तीय असुरक्षा की आशंका
अधिकारियों का मानना है कि विधेयक से कैडर अधिकारियों के बीच मनोबल में गिरावट आएगी और उनकी वित्तीय सुरक्षा को भी खतरा हो सकता है। डीजी (महानिदेशक) और एसजी (विशेष महानिदेशक) जैसे शीर्ष पदों को 100 प्रतिशत आईपीएस अधिकारियों के लिए आरक्षित कर दिया गया है।
इसका मतलब है कि कैडर अधिकारी, अपनी पूरी योग्यता और सेवा अवधि के बावजूद, कभी भी अपने संगठनों का नेतृत्व नहीं कर पाएंगे। अधिकारियों ने इस व्यवस्था को ग्लास सीलिंग करार दिया है। उनका तर्क है कि सरकार कैडर अधिकारियों को उनके स्वयं के सेवा अधिकारों से वंचित करके दोयम दर्जे का नागरिक बनाएगी।
संसदीय समितियों की सिफारिशें और सुप्रीम कोर्ट का आदेश
अधिकारियों ने यह भी कहा कि अतीत में सीएपीएफ मुद्दों की जांच करने वाली संसदीय समितियों ने पाया है कि कैडर कमांडरों के पदोन्नति में ठहराव से मनोबल में गिरावट आती है। समितियों ने उन्हें अपने संबंधित संगठनों के शीर्ष पदों पर आसीन होने की अनुमति देने की सिफारिश की थी।
सेवानिवृत्त सीएपीएफ अधिकारियों का कहना है कि विधेयक का उद्देश्य मई 2025 के एक सुप्रीम कोर्ट के आदेश को बेअसर करना है। उस आदेश में कहा गया था कि सीएपीएफ कैडर अधिकारियों के लिए पदोन्नति में देरी से मनोबल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। अदालत ने केंद्र को इन बलों में आईजी रैंक तक आईपीएस प्रतिनियुक्ति को धीरे-धीरे कम करने का निर्देश दिया था। बीते साल शीर्ष अदालत ने केंद्र द्वारा इस आदेश के खिलाफ दायर समीक्षा याचिका को खारिज कर दिया था।
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सार्वजनिक परामर्श की मांग
सेवानिवृत्त CAPF अधिकारियों और दिग्गजों ने राष्ट्रीय राजधानी में एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि उनके हितों की वकालत करने के लिए उनके पास "कोई लॉबी" नहीं है। उन्होंने सरकार से सार्वजनिक "परामर्श" आयोजित करने का आग्रह किया, यह कहते हुए कि विधेयक अपने वर्तमान स्वरूप में कैडर अधिकारियों के प्रति "भेदभावपूर्ण" है।
यह मुद्दा लगभग 12,000-13,000 सीएपीएफ अधिकारियों के करियर की प्रगति से संबंधित है, जिनकी पहली पदोन्नति सबसे खराब स्थिति में 15-16 साल तक विलंबित हो जाती है, जबकि इसी अवधि में एक आईपीएस अधिकारी चार पदोन्नति प्राप्त करता है।
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