| साल |
आत्महत्या के केस |
| 2012 |
118 |
| 2013 |
113 |
| 2014 |
125 |
| 2015 |
108 |
| 2016 |
92 |
| 2017 |
125 |
| 2018 |
96 |
| 2019 |
129 |
| 2020 |
144 |
| 2021 |
157 |
| 2022 |
135 |
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज की मदद लें...
केंद्रीय गृह मंत्रालय में राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने सदन में गत वर्ष बताया था कि सीएपीएफ में जवानों के मानसिक स्वास्थ्य और उनके कल्याण को बढ़ावा देने के लिए कई तरह के उपाय किए जा रहे हैं। बलों को यह अधिकार दिया गया है कि वे नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज जैसे संगठनों के विशेषज्ञों को शामिल कर सकता है। सरकार ने अन्य बातों के अलावा सीएपीएफ कार्मिकों को अपने परिवार के साथ प्रति वर्ष 100 दिन ठहरने की सुविधा प्रदान करने के लिए उपयुक्त कदम उठाने का निर्णय लिया है। इस संबंध में तौर-तरीके तैयार किए जा रहे हैं।
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बुधवार को इसी संबंध में पूछे गए एक सवाल के जवाब में राय ने बताया, बलों में बेहतर तबादला एवं अवकाश नीति बनाई जा रही है। कठिन क्षेत्र में ड्यूटी के बाद जवान को यथासंभव उसकी पसंदीदा तैनाती पर विचार किया जाता है। अगर कोई ड्यूटी पर घायल होता है तो अस्पताल में बिताई गई अवधि, ड्यूटी की अवधि मानी जाती है। जवानों की शिकायतों का पता लगाने के लिए उनके साथ नियमित संवाद होता है। रहन सहन, मनोरंजन व खेल की सुविधाएं मुहैया कराई गई हैं। जवानों के बच्चों को छात्रवृत्ति सहित विभिन्न कल्याणकारी योजनाएं शुरू की गई हैं। जब कभी रिक्तियां उत्पन्न होती हैं तो पात्र कर्मियों को नियमित रूप से पदोन्नति दी जाती है। 10, 20 व 30 साल की सेवा पूरी होने के बाद एमएसपी के तहत वित्तीय लाभ प्रदान किए जाते हैं।
क्या कहते हैं एसोसिएशन के पदाधिकारी
'कॉन्फेडरेशन ऑफ एक्स पैरामिलिट्री फोर्स मार्टियर्स वेलफेयर एसोसिएशन' के महासचिव रणबीर सिंह का कहना है, इन जवानों को घर की परेशानी नहीं है। सरकार इस मामले में झूठ बोल रही है। इन्हें ड्यूटी पर क्या परेशानी है, इस बारे में सरकार कोई बात नहीं करती। आतंक, नक्सल, चुनावी ड्यूटी, आपदा, वीआईपी सिक्योरिटी और अन्य मोर्चों पर इन बलों के जवान तैनात हैं। इसके बावजूद उन्हें सिविल फोर्स बता दिया जाता है। जवानों को पुरानी पेंशन से वंचित रखा जा रहा है। सिपाही से लेकर कैडर अफसरों तक की प्रमोशन में लंबा वक्त लग रहा है। नतीजा, जवान टेंशन में रहने लगते हैं। केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को भारतीय सेना के बराबर शहीद का दर्जा मिले। इन बलों के लिए पुनर्वास और पुनःस्थापन बोर्ड गठित किया जाए।
बीएसएफ के पूर्व एडीजी संजीव कृष्ण सूद कहते हैं, कई जगहों पर वर्कलोड ज्यादा है। जवान ठीक से सो नहीं पाते हैं। वे अपनी समस्या किसी के सामने रखते हैं, तो वहां ठीक तरह से सुनवाई नहीं हो पाती। ये बातें जवानों को तनाव की ओर ले जाती हैं। कुछ स्थानों पर बैरक एवं दूसरी सुविधाओं की कमी नजर आती है। कई बार सीनियर की डांट फटकार भी जवान को आत्महत्या करने के लिए उकसा देती है। समय पर प्रमोशन या रैंक न मिलना भी जवानों को तनाव देता है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 2019 में सीएपीएफ जवानों को एक साल में 100 दिन की छुटी देने की घोषणा की थी। अभी तक किसी भी बल में यह योजना लागू नहीं हो सकी है।