महिला का सैंपल लेते स्वास्थ्यकर्मी (फाइल फोटो)
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अप्रैल और मई के महीने में 70 प्रतिशत कैंसर मरीजों को परेशानियों का सामना करना पड़ा। इस दौरान उन्हें जीवन रक्षक सर्जरी और उपचार नहीं मिल पाया। यह जानकारी भारत के कुछ सबसे बड़े सुपर स्पेशियलिटी अस्पतालों के आंकड़ों से मिली है। इसमें देशभर में मौजूद कैंसर के अग्रणी निजी अस्पताल का डाटा है।
कोरोना वायरस महामारी के प्रसार को रोकने के लिए 25 मार्च से लागू किए गए लॉकडाउन के बाद अप्रैल और मई में बहुत कम सर्जरी हुई। 2019 के मुकाबले सर्जरी की संख्या घटकर पांचवां हिस्सा ही रह गईं। डाटा के अनुसार पिछले साल की समान अवधि की तुलना में अप्रैल और मई में कैंसर चिकित्सा सेवाओं में 50 प्रतिशत की गिरावट आई।
धीरे-धीरे लॉकडाउन हटने के बाद भी कोरोना वायरस के डर की वजह से कैंसर मरीज अस्पतालों से दूर हैं। वहीं जो इलाज चाहते हैं उन्हें वो नहीं मिल पाया क्योंकि इस समय कोरोना वायरस के इलाज को सबसे पहले प्राथमिकता दी जा रही है। इससे निदान और उपचार में देरी के कारण जीवन को खतरा है।
फरवरी में एक 52 साल की महिला की गर्दन की बाईं ओर एक छोटी सूजन आ गई लेकिन उन्हें ढाई महीने में छह अस्पताल के चक्कर काटने के बाद पता चला कि वह कैंसर से पीड़ित हैं। जून से नई दिल्ली के साकेत स्थित मैक्स सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में उनका इलाज चल रहा है।
मरीज ने कहा, 'बहुत से अस्पतालों ने हमें वापस भेज दिया था। उनका कहना था कि हमारे पास बिस्तर नहीं है। मई के आखिर तक दो अस्पतालों ने कहा कि मेरे घाव की मरहम-पट्टी नहीं कर सकते हैं। लिंफोमा का पता चलने से पहले मुझे बुखार आना शुरू हो गया था।' मरीज की इस समय अस्पताल में कीमोथेरेपी चल रही है।
भारत में मार्च के अंत से लेकर मई के अंत तक कम से कम 51,100 जीवनरक्षक कैंसर सर्जरी को रद्द कर दिया गया था। यह भारत सहित 77 देशों में सर्जनों और एनेस्थेटिस्ट्स के एक शोध नेटवर्क कोविडसर्ज कोलेबोरेटिव का अनुमान है। उसने मई में ब्रिटिश जर्नल ऑफ सर्जरी में अपने निष्कर्ष प्रकाशित किए गए हैं।