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चिंताजनक: कैंसर से भारत समेत दक्षिण एशिया में 14.44 लाख लोगों की मौत, द लैंसेट रिपोर्ट में चौंकाने वाले आंकड़

Sat, 13 May 2023 05:27 AM IST
Jeet Kumar परीक्षित निर्भय, नई दिल्ली।

सार

 विशेषज्ञों ने कहा कि इन देशों में आर्थिक बदलाव, जीवनशैली में बदलाव और बढ़ता मोटापा कैंसर के खतरे को बढ़ा रहा है। इसमें मौजूदा जोखिम कारक जैसे तम्बाकू और इनडोर व आउटडोर वायु प्रदूषण भी शामिल हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
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विस्तार
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वर्ष 2020 में भारत समेत दक्षिण पूर्व एशिया में 22.52 लाख लोग कैंसर ग्रस्त पाए गए। वहीं, इसकी वजह से 14.44 लाख लोगों की मौत हुई।  दक्षिण एशिया में  कैंसर से मौतों का यह आंकड़ा साल-दर-साल बढ़ता जा रहा है, जो काफी चिंताजनक है।

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मेडिकल जर्नल द लैंसेट में प्रकाशित लेख के अनुसार दक्षिण पूर्व एशिया क्षेत्र में 2020 के दौरान कैंसर के 22,52,981 नए मामले सामने आए। इनमें 14,44,528 लोगों की कैंसर से मौत हुई। नए मामलों में सबसे ज्यादा स्तन, गर्भाशय ग्रीवा और फेफड़े के कैंसर दर्ज किए गए।  विशेषज्ञों ने कहा कि इन देशों में आर्थिक बदलाव, जीवनशैली में बदलाव और बढ़ता मोटापा कैंसर के खतरे को बढ़ा रहा है। इसमें मौजूदा जोखिम कारक जैसे तम्बाकू और इनडोर व आउटडोर वायु प्रदूषण भी शामिल हैं।

भारत में 2020 में कैंसर से 7.70 लाख लोगों की मौत हुई। हालांकि यह आंकड़ा हर साल बढ़ता जा रहा है।  केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट बताती है कि बीते 2021 में 7.89 और 2022 में 8.80 लाख लोगों की मौत कैंसर से हुई है। लैंसेट ने अपने लेख के जरिए सभी देशों के चिकित्सक, शोधकर्ता और नीति निर्माताओं से सहयोग करने की अपील की है। साथ ही, कैंसर मरीजों की सेवा को लेकर प्रभावी नीतियां खोजने के लिए निरंतर प्रयास जरूरी बताया।
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पीएजीए प्रोजेक्ट में 10 में से केवल तीन देश शामिल

कैंसर को लेकर यूरोपियन सोसाइटी फॉर मेडिकल ऑन्कोलॉजी की ओर से पैन एशियन गाइडलाइंस एडेप्टेशन (पीएजीए) प्रोजेक्ट संचालित किया जा रहा है। हालांकि अभी तक दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र के 10 में से केवल तीन देश इसमें शामिल हुए हैं, जिनमें भारत भी शामिल है।

तंबाकू उत्पादों के खिलाफ भारत का कदम सराहनीय
लैंसेट के मुताबिक, कैंसर रोकने के लिए तंबाकू उत्पादों के खिलाफ भारत ने हाल ही में कई अहम कदम उठाए हैं। यह दिखाता है कि कैसे राजनीतिक इच्छाशक्ति नीति को लागू करने में परिवर्तनकारी प्रभाव पैदा कर सकती है। हालांकि, मौजूदा स्थिति को देखते हुए भारत को तंबाकू और धूम्रपान को लेकर काफी कुछ करना बाकी है क्योंकि अभी भी इस क्षेत्र में कई मौतों का कारण हैं।

22% आबादी तंबाकू की चपेट में
लैंसेट के अनुसार, तंबाकू दुनिया भर में कैंसर और रोकथाम योग्य मौतों का एक और प्रमुख कारण है। हालांकि दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में तंबाकू का सेवन करने वालों की आबादी करीब 22 फीसदी ही है। यहां सबसे अधिक 78 फीसदी आबादी धूम्रपान नहीं करती है। तंबाकू उत्पादों पर कर बढ़ाना, उत्पाद कीमत बढ़ाना, अवैध तंबाकू व्यापार रोकने की नीतियों पर काम करना प्रभावी हो सकता है।

कर्ज तले दब रहे मरीजों के परिवार
लैंसेट ने अपने जर्नल में चिंता व्यक्त की है कि कैंसर के अधिकांश रोगी निजी सुविधाओं में इलाज के लिए अपनी जेब से खर्च कर रहे हैं क्योंकि सरकारी सुविधाएं ओवरलोड हैं और ग्रामीण स्वास्थ्य प्रणाली इसे लेकर काफी कमजोर है। भारत को भी इस दिशा में ठोस कदम उठाने की अपील की है।

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