एम.एल. लाहोटी ने बताया कि पहले भी कई बार राज्य सरकारों ने तय 50 फीसदी सीमा से ज्यादा आरक्षण दिया था। राजस्थान सरकार ने विशेष पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देते हुए 50 फीसदी की सीमा को पार किया था। जब यह मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा तो आरक्षण को खारिज कर दिया गया।
वहीं दिसंबर 2014 में सर्वोच्च न्यायालय ने बॉम्बे उच्च न्यायालय के आरक्षण पर रोक लगाने के आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया था। महाराष्ट्र सरकार ने आरक्षण सीमा को बढ़ाकर 73 फीसदी कर मराठाओं को नौकरी और शैक्षणिक संस्थाओं में 16 फीसदी आरक्षण देने का फैसले किया था।
बॉम्बे उच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगा दी थी। उच्च न्यायालय ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक आरक्षण कुल सीटों में से 50 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकता। तामिलनाडु सरकार ने 69 फीसदी आरक्षण दिया था जिसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी और मामला अब भी सर्वोच्च न्यायालय में लंबित पड़ा हुआ है।
क्या गरीब सवर्णों को आरक्षण चुनावी जुमला है?
सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ वकील केटीएस तुलसी का कहना है कि कोर्ट ने व्यवस्था दे रखी है कि 9वीं अनुसूची का सहारा लेकर अवैध कानून को का बचाव नहीं किया जा सकता। अगर कोई कानून संवैधानिक दायरे से बाहर होगा तो उसे 9वीं अनुसूची में डालकर नहीं बचाया जा सकता।
क्योंकि संविधान की बुनियादी संरचना के साथ छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण देने के लिए केंद्र सरकार का बिल अगर संसद में पारित भी हो जाता है तो भी उसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकेगी और मौजूदा कानूनी व्यवस्था में उसका टिक पाना बहुत मुश्किल है। इसलिए केंद्र सरकार का यह कदम महज चुनावी जुमला बनकर न रह जाए।