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SC: क्या अदालतें पूर्ववर्ती रियासतों की संपत्तियों के विवादों में दखल दे सकती हैं? सुप्रीम कोर्ट करेगा समीक्षा

Mon, 02 Jun 2025 09:37 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।

सार

SC: सुप्रीम कोर्ट यह तय करने पर राजी हो गया है कि क्या संविधान का अनुच्छेद 363 पुरानी रियासतों और सरकार के बीच हुए समझौतों से जुड़ी संपत्तियों के विवादों पर अदालत में सुनवाई की अनुमति देता है या नहीं। जयपुर के शाही परिवार ने टाउन हॉल और अन्य संपत्तियों के मामले में हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी है।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई (फाइल)
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को यह तय करने पर सहमति जताई कि क्या संविधान का अनुच्छेद 363 उन संपत्तियों के विवादों पर अदालतों को सुनवाई को से रोकता है या नहीं, जो पूर्ववर्ती रियासतों और भारत सरकार के बीच हुए समझौतों से जुड़ी हैं। अनुच्छेद 363 कहता है कि कुछ संधियों, समझौतों, वचनों, अनुबंधों आदि से पैदा किसी भी विवाद में अदालतें दखल नहीं दे सकतीं, अगर वे सरकार और किसी रियासत के बीच हुए हों। 

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जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने जयपुर के शाही परिवार की सदस्य राजमाता पद्मिनी देवी, उप मुख्यमंत्री दीया कुमारी और सवाई पद्मनाभ सिंह की ओर से दायर याचिका पर नोटिस जारी किया है। इस याचिका में उन्होंने टाउन हॉल (पुरानी विधानसभा) और अन्य संपत्तियों के कब्जे को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी है। ये सारी संपत्तियां जयपुर की किलेबंद पुरानी नगरी में स्थित हैं।

राजस्थान हाईकोर्ट ने फैसला दिया था कि टाउन हॉल जैसी संपत्तियों पर जो विवाद पुरानी रियासत और भारत सरकार के बीच हुए समझौते से जुड़ा है, उस पर अनुच्छेद 363 के तहत दीवानी अदालतों में कोई मुकदमा नहीं चल सकता। शाही परिवार की ओर से वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने दलील दी कि जिस समझौते की बात हो रही है, वह पांच राजाओं के बीच हुआ था और भारत सरकार इसमें सिर्फ एक गारंटर (जमानतदार) की भूमिका में थी, न कि सीधा पक्ष। साल्वे ने यह भी कहा कि यह अहम पहलू हाईकोर्ट में बहस के दौरान नहीं उठाया गया था, जिससे 17 अप्रैल का विवादित फैसला आया।
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हालांकि, जस्टिस मिश्रा ने सवाल उठाया कि अगर भारत सरकार इस समझौते की पार्टी नहीं थी, तो फिर जयपुर रियासत का भारत संघ में विलय कैसे हुआ? साल्वे ने जवाब दिया कि विलय उस समझौते के बाद हुआ था, जब संविधान का अनुच्छेद 1 लागू हुआ। जस्टिस मिश्रा ने कहा कि अगर साल्वे की दलील मानी जाए, तो इसका मतलब होगा कि भारत सरकार समझौते की पार्टी नहीं है और इसलिए अनुच्छेद 363 लागू नहीं होता, तब तो हर रियासत का शासक कोर्ट में मुकदमा दायर करेगा और कहेगा कि उसकी संपत्ति उसे लौटा दी जाए। इस पर साल्वे ने कहा कि मुकदमा दायर करना और संपत्ति पर हक होना, दोनों अलग बातें हैं।

साल्वे ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं का मकसद उन संपत्तियों पर दावा करना नहीं है, जो समझौते के अनुसार राज्य सरकार को सौंप दी गई थीं। उन्होंने कहा, जो संपत्तियां राज्य सरकार के पास हैं, उन पर किसी का हक नहीं है। वह मामला अब खत्म हो चुका है। अगर मैं कभी उस संपत्ति की सूची पर सवाल उठाता भी, तब भी वह अनुच्छेद 363 से अलग होकर भी खारिज किया जा सकता है। मैं यह साबित कर सकता हूं।

लेकिन जस्टिस मिश्रा इस बात से संतुष्ट नहीं हुए और कहा, 'तो फिर आप कल कहेंगे कि पूरा जयपुर आपका है। इस तरह तो हर रियासत आएगी और आजादी की मांग करने लगेगी।' इसके बावजूद, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को विस्तार से सुनवाई पर सहमति जताई और राजस्थान सरकार को नोटिस जारी किया। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि इस मामले में दो और मुकदमे दाखिल होने की संभावना है। राजस्थान सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता (एएजी) शिव मंगल शर्मा ने कहा कि मामला बहुत पुराना है, इसलिए राज्य सरकार इस पर फिलहाल कोई कठोर कदम नहीं उठाएगी और संपत्तियों पर यथास्थिति बनाए रखेगी। कोर्ट ने यह बयान रिकॉर्ड पर लेते हुए अगली सुनवाई आठ हफ्ते बाद तय की है।

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यह विवाद जयपुर के पूर्व शाही परिवार और राज्य सरकार के बीच कई संपत्तियों को लेकर दशकों से चला आ रहा है। टाउन हॉल, पुराना पुलिस मुख्यालय, पुराना होम गार्ड महानिदेशालय और पुराना लेखाधिकारी कार्यालय परिसर विवादित संपत्तियां हैं और इस समय सरकार के कब्जे में हैं। शाही परिवार के सदस्यों ने पहले सिविल कोर्ट में चार मुकदमे दाखिल किए थे, जिनमें टाउन हॉल की जब्ती, कब्जा, स्थायी निषेधाज्ञा और मुआवजे की मांग की गई थी।

उन्होंने यह भी कहा था कि टाउन हॉल का इस्तेमाल 2001 तक ही सरकारी कार्यों में हुआ और उसके बाद से यह खाली पड़ा है, क्योंकि अब नई विधानसभा बन चुकी है। ऐसे ही दावे अन्य संपत्तियों को लेकर भी किए गए हैं, जिनकी मौजूदा कीमत हजारों करोड़ बताई जा रही है। राजस्थान हाईकोर्ट ने 17 अप्रैल को दिए फैसले में शाही परिवार के दावों को खारिज करते हुए कहा था कि ये सारी संपत्तियां सरकार की हैं और इस तरह के दावों पर कोई दीवानी अदालत सुनवाई नहीं कर सकती। 

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