बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक सुनवाई के दौरान वकील द्वारा अपने मुवक्किल के मामले की कार्यवाही को "ज्यूडिशियल टेररिज्म" (न्यायिक आतंकवाद) बताने पर कड़ी नाराज़गी जताई है। अदालत ने इसे न्यायपालिका पर अनुचित हमला करार देते हुए वकील के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी दी और कारण बताओ नोटिस जारी किया।
किस वकील को नोटिस जारी किया गया?
जस्टिस अनिल पानसरे और जस्टिस रजनीश व्यास की नागपुर खंडपीठ ने 13 जुलाई को पारित अपने आदेश में अधिवक्ता वी. ए. कोठाले को कारण बताओ नोटिस जारी किया। अदालत ने उनसे जवाब मांगा है कि उनके कथित अनुचित आचरण को लेकर उन्हें महाराष्ट्र एवं गोवा बार काउंसिल के पास कार्रवाई के लिए क्यों न भेजा जाए।
मामला किस याचिका से जुड़ा था?
हाईकोर्ट एक महिला शिक्षिका की याचिका पर सुनवाई कर रहा था। याचिका में उस स्कूल को निर्देश देने की मांग की गई थी, जहां वह कार्यरत थीं, ताकि सेवानिवृत्ति की तिथि से उनका बकाया वेतन, भविष्य निधि (पीएफ) और ग्रेच्युटी का भुगतान किया जा सके। साथ ही संबंधित विश्वविद्यालय को यह निर्देश देने की भी मांग की गई थी कि यदि स्कूल बकाया राशि का भुगतान नहीं करता है तो उसकी मान्यता रद्द कर दी जाए।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने क्या पूछा?
सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ता के वकील से पूछा कि यह याचिका किस कानूनी आधार पर सुनवाई योग्य है और किस वैधानिक प्रावधान के तहत किसी स्कूल की मान्यता रद्द करने का निर्देश दिया जा सकता है। हालांकि, अदालत के अनुसार वकील संबंधित कानूनी प्रावधान बताने के बजाय सामान्य तर्क देते रहे।
कोर्ट ने 50 हजार रुपये जमा कराने का निर्देश क्यों दिया?
वकील की दलीलों से संतुष्ट न होने पर खंडपीठ ने याचिकाकर्ता को एक सप्ताह के भीतर 50,000 रुपये जमा कराने का निर्देश दिया और स्पष्ट किया कि ऐसा नहीं करने पर याचिका खारिज कर दी जाएगी।
'ज्यूडिशियल टेररिज्म' वाली टिप्पणी पर कोर्ट ने क्या कहा?
अदालत के इस आदेश से नाराज़ होकर अधिवक्ता वी. ए. कोठाले ने टिप्पणी की कि यह कार्यवाही 'ज्यूडिशियल टेररिज्म' के समान है। इस पर हाईकोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि यह टिप्पणी पूरी तरह अनुचित है, बार के सदस्य के लिए अशोभनीय है और न्यायपालिका जैसी संस्था पर अनुचित हमला है।
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हाईकोर्ट ने आगे क्या निर्देश दिए?
कोर्ट ने अधिवक्ता को 28 जुलाई तक कारण बताओ नोटिस का जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। साथ ही कहा कि 'ज्यूडिशियल टेररिज्म' जैसे आरोप अदालत की गरिमा और न्यायपालिका की पवित्रता को ठेस पहुंचाने की क्षमता रखते हैं। इसलिए इस तरह की टिप्पणियों को हल्के में नहीं लिया जा सकता।