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Railway: ट्रेनों को सुपरफास्ट बताकर यात्रियों से वसूले 168 करोड़, इस रिपोर्ट में सफाई व्यवस्था भी कटघरे में

Fri, 14 Aug 2026 04:37 PM IST
Devesh Tripathi डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

रेलवे स्वच्छता और रखरखाव पर हर साल सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च करने का दावा करता है। लेकिन ऑडिट टीम को यह साफ नहीं बताया जा सका कि कितना बजट सफाई पर खर्च हुआ और कितना इस्तेमाल नहीं हुआ।
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भारतीय रेलवे - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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भारतीय रेलवे में यात्रियों से सुपरफास्ट ट्रेन के नाम पर अतिरिक्त शुल्क वसूले जाने का मामला सामने आया है। सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल 2022 से मार्च 2023 के बीच रेलवे ने यात्रियों से करीब 168 करोड़ रुपये का सुपरफास्ट सरचार्ज वसूला। जांच में 190 से ज्यादा ऐसी ट्रेनें मिलीं, जो सुपरफास्ट का दर्जा पाने की तय गति पूरी नहीं करती थीं। रेलवे के नियमों के मुताबिक, किसी ट्रेन पर सुपरफास्ट सरचार्ज तभी लगाया जा सकता है, जब शुरुआती और अंतिम स्टेशन के बीच उसकी औसत रफ्तार कम से कम 55 किमी प्रति घंटा हो। इससे कम औसत गति वाली ट्रेन मेल या एक्सप्रेस श्रेणी में आती है।
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मार्च 2026 तक 100 ट्रेनें तय रफ्तार से पीछे
सीएजी ने रेलवे के इंटीग्रेटेड कोच मैनेजमेंट सिस्टम के आंकड़ों की भी जांच की। इसमें सामने आया कि चिन्हित 190 से ज्यादा ट्रेनों में से 100 ट्रेनें मार्च 2026 तक भी 55 किमी प्रति घंटा की औसत रफ्तार हासिल नहीं कर सकीं। इसके बावजूद इन ट्रेनों में सफर करने वाले यात्रियों से सुपरफास्ट सरचार्ज लिया जा रहा था। रिपोर्ट में इसे रेलवे के निर्धारित नियमों और निर्देशों के पालन में कमी से जोड़कर देखा गया है।

वही सीएजी यानी नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक की रिपोर्ट ने रेलवे में बायो टॉयलेट के रखरखाव और बजट के इस्तेमाल पर सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रेन में ऑनबोर्ड सफाई व्यवस्था से करीब 50 प्रतिशत यात्री संतुष्ट नहीं हैं।  लंबी दूरी की ट्रेनों में सफर करने वाले करोड़ों यात्रियों की सुविधा पर इसका सीधा असर पड़ रहा है। सीएजी ने संसद में पेश रिपोर्ट में कहा कि बजट की कमी नहीं है। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर काम और वित्तीय अनुशासन में कमी सामने आई है।
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यात्रियों ने किन बातों पर जताई असंतुष्टि?
इसके अलावा ट्रेनों में सफाई की स्थिति पर खराब मिली। सर्वे में 40 फीसदी से ज्यादा यात्रियों ने टॉयलेट में बदबू और पानी जमा होने की शिकायत की। वहीं,50 प्रतिशत से ज्यादा यात्री ऑन-बोर्ड हाउसकीपिंग सेवा और सफाई कर्मचारियों की कमी से असंतुष्ट मिले। डिब्बों की आधुनिक सफाई के लिए मंजूर ऑटोमेटिक कोच वाशिंग प्लांट जैसी परियोजनाओं की समय पर प्रगति भी नहीं हुई। इनका समयबद्ध क्रियान्वयन शून्य रहा। झांसी और ग्वालियर जैसे प्रमुख स्टेशनों के लिए बजट मिलने के बावजूद परियोजनाएं अटकी रहीं।

रेलवे स्वच्छता और रखरखाव पर हर साल सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च करने का दावा करता है। लेकिन ऑडिट टीम को यह साफ नहीं बताया जा सका कि कितना बजट सफाई पर खर्च हुआ और कितना इस्तेमाल नहीं हुआ। रिपोर्ट के मुताबिक, बजट आवंटन और वास्तविक खर्च का पारदर्शी रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराया गया। वित्तीय कार्रवाई का सटीक हिसाब न होना सीएजी ने बड़ी अनियमितता माना है।
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