आम बजट के असर को लेकर अर्थशास्त्री एक राय नहीं हैं। अर्थशास्त्री सारथी आचार्य को यह चुनौतियों को देखते हुए कम समझ में आ रहा है। उनके अनुसार सबसे बड़ी चुनौती मध्यम वर्ग को संकट से उबारने के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने की है, लेकिन इसका रोड-मैप बहुत धुंधला है। वहीं अर्थशास्त्री सौम्य कांति घोष का कहना है कि यह बजट अर्थ व्यवस्था को नई रफ्तार देने वाला है। आधारभूत संरचना विकास में तेजी आएगी तो रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।
बकौल सारथी आचार्य स्वास्थ्य क्षेत्र में जरूर बड़ी रोशनी दिखाई है। इस तरह से सारथी आचार्य कोविड-19 के बाद की चुनौतियों को देखते हुए 10 में से 6 अंक ही देना चाहते हैं। वहीं घोष का कहना है कि कोविड-19 संक्रमण की चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है। ऐसे में स्वास्थ्य क्षेत्र में बड़े सुधार, संसाधन की आवश्यकता है और बजट उस लक्ष्य को लेकर आगे बढ़ने वाला है। बजट में कई लक्ष्यों की तरफ ध्यान केन्द्रित किया गया है। अभी जरूरत तेजी से अर्थव्यवस्था में सुधार करके वृद्धि दर को आगे बढ़ाना है। कुल मिलाकर इस बजट का मकसद अर्थ व्यवस्था की गाड़ी को रफ्तार देना है।
सौम्य कांति घोष का यह तर्क सारथी आचार्य को प्रेरित नहीं करता। आचार्य कहते हैं कि केवल सड़क, हाई वे बनाने से अंतरराष्ट्रीय निवेश नहीं आ जाता। दूसरे आधारभूत संरचना के विकास क्रम में महत्वपूर्ण है कि पहले देश की एयर इंडिया बिकेगी तो आने वाले पैसे को फला क्षेत्र में लगाया जाएगा। यह होगा तो वह किया जाएगा?
सारथी को इसलिए नहीं समझ आया बजट-
सारथी कहते हैं कि मुझे यह बजट कम समझ में आता है, क्योंकि एयर इंडिया तो हम कब से बेच रहे हैं। जाने कब बिकेगा और कब देश के संसाधनों के विकास में प्रगति आएगी। दूसरे किसी क्षेत्र में आलू के चिप्स की फैक्ट्री लगने के बाद उस क्षेत्र के किसानों को आलू के सही दाम मिलने की कोई गारंटी या स्थिति नहीं देखी गई। कोविड-19 संक्रमण के दौरान कृषि क्षेत्र ने अच्छा सहारा दिया है, लेकिन बजट में मनरेगा के बजट में कोई उत्साह नहीं दिखाई दिया है। इसलिए न तो कृषि क्षेत्र में संरचना विकास में कुछ खास होने जा रहा है और न ही रोजगार के क्षेत्र में कुछ सुधरने की तस्वीर दिखाई पड़ रही है।
देश के उत्पादन क्षेत्र में रफ्तार लाने के लिए सूक्ष्म, लघु, मझोले उद्योगों को कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता दिखाई पड़ रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पेट्रोल-डीजल के दाम घट रहे हैं। भारत में लगातार बढ़ रहे हैं। इसका असर देश के घरेलू औद्योगिक विकास पर भी पड़ रहा है। कृषि से लेकर हर स्तर पर इसका असर है। इसलिए चुनौतियां बनी रहेंगी और गाड़ी भी चलती रहेगी। बहुत अधिक उम्मीद भी नहीं की जा सकती।