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ब्रिक्स: एनएसए बैठक आज से, चीनी विदेश मंत्री भी होंगे शामिल; चीन की कथनी-करनी का होगा कूटनीतिक परीक्षण

Mon, 22 Jun 2026 05:37 AM IST
Devesh Tripathi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

ब्रिक्स देशों के एनएसए की दो दिवसीय 16वीं बैठक सोमवार से भारत में होगी। बैठक में सुरक्षा, आतंकवाद और तकनीकी खतरों पर चर्चा होगी। इसमें अजीत डोभाल और चीन के वांग यी शामिल होंगे। भारत सीमा विवाद पर सख्त रुख रखते हुए डैपसांग और डेमचोक से चीनी सैनिकों की वापसी का मुद्दा उठा सकता है।
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विस्तार
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भारत की मेजबानी में सोमवार से ब्रिक्स देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों (एनएसए) और उच्च प्रतिनिधियों की 16वीं बैठक शुरू हो रही है। दो दिवसीय इस बैठक की अध्यक्षता राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल करेंगे। सितंबर में प्रस्तावित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले आयोजित यह बैठक सदस्य देशों के बीच राजनीतिक और रणनीतिक सहमति बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

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बैठक का औपचारिक एजेंडा गैर-पारंपरिक सुरक्षा चुनौतियों, आतंकरोधी सहयोग और नई प्रौद्योगिकियों से जुड़े खतरों पर केंद्रित है। वहीं, भारत और चीन के बीच जारी सीमा गतिरोध की पृष्ठभूमि इसे अतिरिक्त महत्व प्रदान कर रही है।

क्या होगा बैठक का एजेंडा?
विदेश मंत्रालय के अनुसार, बैठक का मुख्य विषय दुनिया के सामने तेजी से उभर रही गैर-पारंपरिक सुरक्षा चुनौतियां होंगी। सदस्य देशों के प्रतिनिधि बदलते वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य, नई तकनीकों के दुरुपयोग से पैदा हो रहे खतरों और उनसे निपटने के उपायों पर विचार-विमर्श करेंगे। इसके अलावा आतंकरोधी सहयोग तथा सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकियों के सुरक्षित उपयोग पर गठित ब्रिक्स संयुक्त कार्य समूहों के निष्कर्षों की भी समीक्षा की जाएगी।
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सीमा विवाद की पृष्ठभूमि में क्यों अहम है ये बैठक?
बैठक में चीन का प्रतिनिधित्व विदेश मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों के उच्च प्रतिनिधि वांग यी करेंगे। डोभाल के निमंत्रण पर उनकी भारत यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर लंबे समय से तनाव की स्थिति बनी हुई है। दोनों देशों के बीच कूटनीतिक और सैन्य स्तर पर कई दौर की बातचीत के बाद कुछ विवादित बिंदुओं से सैनिकों की आंशिक वापसी जरूर हुई है, लेकिन पूर्ण सैन्य वापसी और गश्त के अधिकारों को लेकर गतिरोध अब भी कायम है।

यही कारण है कि यह बैठक केवल बहुपक्षीय सुरक्षा मुद्दों तक सीमित नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे भारत-चीन संबंधों के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण नजर से देखा जा रहा है। डोभाल और वांग यी की मौजूदगी में होने वाला यह संवाद इस बात का संकेत है कि दोनों देश मतभेदों के बावजूद बातचीत के रास्ते खुले रखना चाहते हैं। हालांकि भारत का रुख इस मामले में पहले से स्पष्ट और सख्त रहा है। भारत लगातार यह कहता रहा है कि सीमा पर पूर्ण शांति और स्थिरता बहाल हुए बिना द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य नहीं माना जा सकता।

चीन की कथनी और करनी की होगी परीक्षा
इस बैठक को चीन की कथनी और करनी की परीक्षा के रूप में भी देखा जा रहा है। एक ओर चीन बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग और साझेदारी की बात करता है, वहीं दूसरी ओर सीमा विवाद से जुड़े मुद्दे अब भी पूरी तरह सुलझ नहीं पाए हैं। भारत के लिए यह अवसर चीन के वास्तविक रुख को परखने का भी माना जा रहा है। इसके पूरे आसार हैं कि भारत चीनी पक्ष के सामने डैपसांग और डेमचोक जैसे रणनीतिक क्षेत्रों से चीनी सैनिकों की पूर्ण वापसी का मुद्दा उठाए। इस दृष्टि से बैठक दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हो सकती है।

कौन सी रणनीति अपना रहा चीन?
चीन की रणनीति लंबे समय से सीमा विवाद को अलग रखते हुए व्यापारिक और बहुपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने की रही है। बीजिंग यह संदेश देना चाहता है कि सीमा पर मतभेदों के बावजूद दोनों बड़ी एशियाई शक्तियां ब्रिक्स जैसे मंचों पर मिलकर काम कर सकती हैं। वांग यी की भारत यात्रा को इसी रणनीति के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।

चीन की इस सक्रियता के पीछे उसकी भूराजनीतिक चुनौतियां भी मानी जा रही हैं। पश्चिम के साथ बढ़ते व्यापार युद्ध और अमेरिका की घेराबंदी के बीच चीन ब्रिक्स को एक मजबूत पश्चिम-विरोधी मंच के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है। इसके लिए उसे भारत जैसे प्रमुख सदस्य देश के सहयोग की आवश्यकता है। हालांकि भारत इस समीकरण को भलीभांति समझता है और वह ऐसा कोई संकेत नहीं देना चाहता कि सीमा पर जारी विवादों को नजरअंदाज कर सामान्य सहयोग की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।
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बैठक पर रहेंगी सभी की नजरें
ऐसे में नई दिल्ली में शुरू हो रही यह बैठक केवल सुरक्षा सहयोग और उभरती चुनौतियों पर चर्चा का मंच नहीं होगी, बल्कि भारत-चीन संबंधों के भविष्य, सीमा विवाद पर प्रगति की संभावनाओं और चीन की वास्तविक प्रतिबद्धताओं को परखने का अवसर भी साबित हो सकती है। इसी वजह से ब्रिक्स एनएसए बैठक पर क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक हलकों की नजरें टिकी हुई हैं।

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