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संसद में धरना खत्म कर विपक्षी सांसदों ने कहा, अब सड़कों और गांवों में लड़ेंगे लड़ाई

Wed, 23 Sep 2020 05:14 AM IST
Jeet Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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संसद परिसर में धरना देते आठ निलंबित सांसद - फोटो : PTI
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कृषि विधेयकों पर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों में से कोई पीछे हटने को तैयार नहीं है। सरकार ने जहां विपक्ष के बहिष्कार के बीच मंगलवार को कृषि से जुड़ा तीसरा विधेयक आवश्यक वस्तु संशोधन बिल राज्यसभा से पारित करवा लिया। 

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वहीं, संसद परिसर में रातभर धरना देने वाले आठ सांसदों ने धरना खत्म करने के बाद कहा कि अब वह किसानों के साथ सड़क और गांवों में किसानों की लड़ाई लड़ेंगे।

मंगलवार सुबह धरना खत्म होने के बाद तृणमूल कांग्रेस की निलंबित सांसद डोला सेन ने कहा, विपक्ष ने सदन का बहिष्कार किया है, इसलिए हम धरना खत्म कर रहे हैं। अब इस लड़ाई को गांवों और राज्यों में लेकर जाएंगे।
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किसानों के साथ देशभर में इन विधेयकों के खिलाफ अलख जलाएंगे। लोकतांत्रिक अधिकारों किसानों और संसद की हमारी लड़ाई में एकजुटता व्यक्त करने के लिए कई राजनीतिक दलों के नेता रातभर धरनास्थल पर आए। माकपा के इलामारम ने कहा, सदन से निलंबित करके हमारी आवाज नहीं दबाई जा सकती। हम किसानों के साथ उनके अधिकारों की लड़ाई जारी रखेंगे।

आप के सांसद संजय सिंह ने कहा, सरकार ने किसानों के अधिकारों पर कुठाराघात करते हुए काला कानून पास किया है।

इससे पहले निलंबित सांसद कांग्रेस के राजीव सातव, सैयद नजीर हुसैन और रिपुन बोरा, तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओ ब्रायन और डोला सेन, माकपा के केके रागेश और इलामारम करीम तथा आप के संजय सिंह सोमवार को पूरी रात संसद परिसर में गांधी प्रतिमा के नीचे बैठे रहे।

यहां इन लोगों ने देशभक्ति के गाने गाए और कविता पाठ किया। संसद के इतिहास में संभवत: पहली बार रातभर चले धरने के दौरान कई विपक्षी नेता समर्थन देने पहुंचे। इनमें नेशनल कॉन्फ्रेंस के फारूक अब्दुल्ला, सपा की जया बच्चन, कांग्रेस के अहमद पटेल, दिग्विजय सिंह और शशि थरूर भी शामिल थे।

हम धरने पर हैं, चाय पार्टी में नहीं
राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश रातभर धरने पर बैठे आठ सांसदों के लिए मंगलवार सुबह चाय और नाश्ता लेकर पहुंचे। इस दौरान धरने पर बैठे सांसदों ने उपसभापति से मुलाकात की लेकिन चाय स्वीकार नहीं की।

कांग्रेस के बोरा ने कहा, हरिवंश जी यहां साथी के रूप में आए हैं। हम किसानों की लड़ाई जारी रखेंगे। इससे कोई समझौता नहीं होगा। वहीं, आम आदमी पार्टी के संजय सिंह ने कहा, हम धरने पर हैं चाय पार्टी पर नहीं। हम उपसभापति का सम्मान करते हैं। धरने के बाद हम सभी सांसद अपने आवास पर उन्हें चाय के लिए आमंत्रित करेंगे।

सदन की भावना संख्या से नहीं तय होती : आजाद
इससे पहले राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष गुलाम नबी आजाद ने कहा, समय की कमी समस्या की जड़ है। सदस्यों को बोलने के लिए अधिक समय चाहिए। खासकर छोटे दलों को दो-तीन मिनट मिलता है, जिसमें बात पूरी नहीं हो पाती।

रविवार की घटना का जिक्र करते हुए आजाद ने कहा, उस दिन सदन की भावना की बात हुई लेकिन भावना सदस्यों की संख्या से तय नहीं होती। यह राजनीतिक दलों पर निर्भर होनी चाहिए। उस दिन 18 पार्टियां एक साथ थीं।

वहीं, सपा सांसद प्रो. रामगोपाल यादव ने कहा, मैं वरिष्ठ सांसद हूं। सदन में जो कुछ हुआ मैंने उसके लिए माफी मांग ली। इसके बाद भी कोई जवाब नहीं मिला। यह अपमानजनक और मुझे कष्ट है। सपा पूरे सत्र का बहिष्कार करेगी।

विपक्ष को सदन में बोलने नहीं दिया जा रहा : रमेश
राज्यसभा में कांग्रेस के मुख्य सचेतक जयराम रमेश ने कहा, सरकार सदन पर विधेयकों केा थोप रही है। आठ सांसदों को बिना बात सुने निलंबित कर दिया गया। निलंबन प्रस्ताव पर भी मतविभाजन नहीं हुआ। यह नियमों के खिलाफ है। नेता प्रतिपक्ष और विपक्ष के नेताओं को सदन में बोलने नहीं दिया जा रहा।

साथ ही कहा कि विपक्ष को सरकार की ओर से चर्चा में शामिल नहीं किया गया। महत्वपूर्ण विधेयकों को स्थायी और तदर्थ समिति में नहीं भेजा जा रहा। कृषि संबंधी विधेयकों पर मतविभाजन नहीं हुआ। न्यूनतम समर्थन मूल्य कृषि विक्रय कानून का हिस्सा नहीं बनाया गया और निजी व्यापार पर भी नहीं लागू किया गया।

राष्ट्रपति का समय न देना दुर्भाग्यपूर्ण : कांग्रेस
राष्ट्रपति भवन से विपक्षी दलों को मुलाकात का समय न मिलने पर कांग्रेस ने प्रतिक्रिया जताई है। महासचिव रणदीप सुरजेवाला ने एक सवाल के जवाब में कहा कि राष्ट्रपति जी भी समय नहीं दे रहे, कारण हमें मालूम नहीं परंतु ये दुर्भाग्यपूर्ण और खेदपूर्ण है। उन्होंने कहा कि देश के 62 करोड़ किसान, खेत मजदूर, गरीब और मेहनतकश को निराशा हुई। हमें उम्मीद थी कि महामहिम राष्ट्रपति जी सबसे पहले विपक्षी दलों से मिलेंगे और इस काले कानून को काटा मारकर, फाड़कर फेंक देंगे। जबकि राष्ट्रपति जी चुप हैं। कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों से मिलने तक को तैयार नहीं। देश के पहले नागरिक, जिनका कर्तव्य है, अगर सरकार भटक जाए, तो उसे सीधे रास्ते पर लाएं। जिनका कर्तव्य है कि वो संविधान की रक्षा करें।  उनका कर्तव्य है कि खेत मजदूर, गरीब, जिनकी नुमाइंदगी वो भी करते हैं उनकी बात, चीत्कार, उनकी पीड़ा और हुंकार को सुनें।

उपसभापति नहीं सुन रहे थे, आप मेरे पास भी आ सकते थे : नायडू
राज्यसभा में सभापति एम. वैंकेया नायडू ने कहा, रविवार को सदन में हुई घटना की निंदा करते हुए कहा, आप अखबार उठाकर देंखे। निलंबित सांसदों ने अपनी हरकत को न्यायसंगत ठहराया और कहा कि इसमें गलत क्या था?

उन्होंने कहा, किसी भी मुद्दे पर मतविभाजन की मांग करना सदस्य का अधिकार है लेकिन ये काम वेल में आए बिना अपनी सीट से कर सकते हैं। अगर उपसभापति आपकी बात नहीं सुन रह थे तो मेरे पास आ सकते थे।

उपसभापति का निलंबित सांसदों के पास जाना उनका बड़प्पन है
सभापति ने कहा, उपसभापति हरिवंश धरना दे रहे सांसदों के लिए सुबह चाय लेकर गए। हम सब जानते हैं वह उपवास पर है। हम सब उनकी तारीफ करते हैं। यह उनकी मानवता और लोकतांत्रिक मूल्यों को दिखाता है।

उपसभापति को अपशब्द भी कहे गए, इसके बावजूद वह धरना दे रहे सांसदों के लिए चाय लेकर पंहुचे। उन्होंने उन लोगों के सामने अपनी बात रखी और पीड़ा बताई। यह उनका बड़प्पन है। सभी से अपील है सदन की मर्यादा बनाए रखें।

निलंबित सांसदों के समर्थन में पवार का उपवास
नसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने निलंबित सांसदों के समर्थन में मंगलवार को एक दिन का उपवास रखा। उन्होंने कहा, उपसभापति ने नियमों को प्राथमिकता नहीं दी। पवार ने धरने पर बैठे सांसदों के लिए चाय ले जाने को भी अनुचित बताया। पवार ने कहा, मैं 50 साल से ज्यादा समय से संसद में हूं। मैंने कभी नहीं देखा कि सदस्यों को विचार रखने पर निलंबित किया गया हो।

सरकार और विपक्ष मिलकर गतिरोध खत्म करे, ताकि संसद की कार्यवाही सुचारु रूप से चल सके। संसद और लोकतंत्र सहयोग से ही चलता है।
- एचडी देवगौड़ा, पूर्व प्रधानमंत्री

हम केवल निलंबन खत्म करने की मांग नहीं कर रहे। हम चाहते हैं कि रविवार को पास कृषि संबंधी दोनों विधेयकों पर मतविभाजन कराया जाए।
-सैयद नासिर हुसैन, कांग्रेस के निलंबित सांसद

राज्यसभा में जो कुछ हुआ वह दुर्भाग्यपूर्ण है। अगर निलंबित सांसद अपने किए पर माफी मांगते हैं तो सरकार उनका निलंबन खत्म करने को तैयार है।
- प्रह्लाद जोशी, संसदीय कार्यमंत्री

...तो उपसभापति की हत्या हो सकती थी: गिरिराज
सदन में केवल बिहार के बेटे पर हमला नहीं हुआ बल्कि राज्यसभा के उपसभापति पर हमला हुआ। यह लोकतंत्र और सांविधानिक व्यवस्था पर हमला था। अगर समय पर मार्शल न बुलाए जाते तो उपसभापति की हत्या हो सकती थी।
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- गिरिराज सिंह, केंद्रीय मंत्री

 

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