बीआरआई चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की एक महत्वाकांक्षी परियोजना है। बीआरआई परियोजना का मकसद दुनियाभर में चीन के निवेश से बुनियादी परियोजनाओं का विकास करना और चीन के प्रभुत्व को बढ़ाना है।
2013 में सत्ता में आने के बाद शी जिनपिंग ने शुरू किया था। चीन ने आर्थिक मंदी से उबरने, बेरोजगारी से निपटने और अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए बीआरआई परियोजना को लेकर आया है।
बीआरआई अरबों डॉलर का प्रोजेक्ट है, चीन ने बीआरआई को मूर्त रूप देने के लिए बीआरएफ (बेल्ड एंड रोड फोरम) फॉर इंटरेशनल कोऑपरेशन बनाया है। इसमें पाकिस्तान, सिंगापुर, इटली जैसे कई देश सदस्य हैं।
इस परियोजना के तहत चीन ने एशिया, यूरोप और अफ्रीका को सड़क मार्ग, रेलमार्ग, गैस पाइप लाइन और बंदरगाह से जोड़ने के लिए सिल्क रोड इकोनॉमिक बेल्ट और मेरीटाइम सिल्क रोड परियोजना शुरू की है।
बीआरआई के तहत छह गलियारे बनाने की योजना है, जिनमें से कई गलियारों पर काम भी जारी है। इसमें पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) से गुजरने वाला चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा भी शामिल है।
चीन द्वारा श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह को कर्ज के बदले 99 साल की लीज पर लेने के बाद भारत की चिंताएं और बढ़ गई थीं।
दुनिया के कई देशों ने जताई चिंता
चीन की बीआरआई परियोजना को लेकर भारत और अमेरिका समेत कई देश चिंता जता चुके हैं। अमेरिका ने साफतौर पर कह चुका है कि चीन की बीआरआई परियोजना दूसरे देशों की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा साबित हो सकती है। इसके अलावा इस प्रॉजेक्ट के जरिए कई छोटे देश चीन के कर्ज के बोझ तले दब सकते हैं।
बीआरआई की होने वाली दूसरी बैठक से पहले भी अमेरिका ने इस प्रोजेक्ट को लेकर अपनी चिंताएं जाहिर की हैं। अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने कहा है कि चीन का यह प्रोजेक्ट इन देशओं के किए आर्थिक सहयोग कम और खतरा ज्यादा है। पोम्पियो ने कहा कि ओबीओआर समेत दुनिया भर में चल रही चीन की परियोजनाओं में राष्ट्रीय सुरक्षा के तत्व शामिल हैं।
अमेरिका इसे वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपने लिए सबसे बड़ी चुनौती मान रहा है। अमेरिका के पार्टनर के तौर पर जापान और भारत चीन की परियोजना के पीछे की सोच को समझते हुए आपत्ति जताते रहे हैं। इसके साथ ही अमेरिका ने चीन के उभार को रोकने की भी लगातार कोशिशें की हैं।
साल 2011 में उसने ‘पाइवट एशिया’ लॉन्च किया। इसके तहत ऑस्ट्रेलिया, जापान और भारत को अपने साथ जोड़ा, ताकि एशिया-प्रशांत क्षेत्र में वह अपनी सैन्य ताकत बढ़ा सके। इसके अलावा दक्षिण कोरिया और ताइवान भी साझेदार हैं। अमेरिका रक्षा पर जितना पैसा खर्च कर रहा है, उसका मुकाबला चीन नहीं कर सकता। चीन से पांच गुना पैसा इस मद में अमेरिका खर्च करता है।
पाकिस्तान में निवेश पर भारत को आपत्ति
भारत ने सीपीईसी में भारी निवेश पर चीन से अपनी चिंता भी जताई है। हाल ही में दोनों देशों के अधिकारियों के बीच ट्रैक-2 स्तर की बैठक हुई। इसमें भारतीय दल ने पाकिस्तान में चीन की ओर से किए जा रहे भारी निवेश पर सवाल उठाया।
भारतीय दल की ओर से वार्ता में 1267 यूएनएससी समिति में आतंकियों को बचाने को लेकर मामला उठाया गया, लेकिन चीनी दल ने कहा कि यह फैसला उनकी ओर से नहीं लिया गया है। यह निर्णय शीर्ष स्तर के नेतृत्व की ओर से लिया गया है। चीन ने इस बैठक में पाकिस्तान में निवेश पर ये कोरी दलील दी कि ऐसा करने से पाक में स्थिरता आएगी और आतंकवाद पर लगाम लगाने की दिशा में कदम उठाए जा सकेंगे।
चीन की विस्तारवादी नीति और दक्षिण चीन सागर में उसके प्रभाव को रोकने के लिए अमेरिका ने क्वाड्रिलैटरल सिक्योरिटी डॉयलॉग संगठन (क्वाड) बनाया है। इसमें अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत शामिल हैं। दक्षिण-चीन समुद्र में चीन की मनमानी और एशिया में बढ़ते प्रभुत्व के लिए बनाए क्वाड को चीन अपने लिए बड़ा खतरा मानता है।
कर्ज देने पर चीन की सफाई
चीन अमेरिका और भारत की चिंताओं पर सफाई देता है। चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने पिछले महीने हुई सालाना मीडिया ब्रीफिंग में बताया कि बीआरएफ सम्मेलन अप्रैल में होगा और यह 2017 की तुलना में कहीं अधिक बड़े पैमाने पर आयोजित होगा। साथ ही इसमें पहले की तुलना में अधिक अंतरराष्ट्रीय सहभागिता दिखेगी।
वांग ने अमेरिका और भारत तथा कई देशों के उन आरोपों का खंडन किया कि बीआरआई छोटे देशों को कर्ज के बोझ की जाल में फंसा रहा है। वांग ने दावा किया, 'बीआरआई कर्ज का जाल नहीं है जिसमें कुछ देश फंस जाएं बल्कि यह एक आर्थिक मदद है जो स्थानीय आबादी को फायदा पहुंचाता है।'
हालांकि जानकारों का मानना है कि चीन पर पूरी तरह विश्वास नहीं किया जा सकता।