किताब के अनुसार, 'पार्टी की हालत देख अमित शाह इस नतीजे पर पहुंच चुके थे कि पार्टी को अप्रासंगिक और आधारहीन हो चुके नेताओं से मुक्त कर नया नेतृत्व खड़ा करना होगा। अति पिछड़ी जातियां जो इस ध्रुवीकरण की परिधि पर बैठी हैं, उनके भीतर असरदार नेतृत्व पैदा कर एक नई सामाजिक गोलबंदी करनी होगी तथा चुनाव नहीं, बल्कि बूथ जीतने की योजना बनानी होगी। हिंदुत्व के एजेंडे को सोशल इंजीनियरिंग से जोड़ना होगा।'
अमित शाह को मई 2013 में उत्तर प्रदेश का प्रभारी नियुक्त किया गया और लेखकों के अनुसार, अगले एक वर्ष में उन्होंने यूपी में सोशल इंजीयरिंग की एक ऐसी दीवार बनाई जो भाजपा के लिए अभेद्य किला बन गयी। शाह की 'सोशल इंजीनियरिंग' ने जातिवाद के आधार पर तैयार होने वाले क्षेत्रीय दलों अथवा छत्रपों की सियासी जमीन को दरका दिया। शाह के ‘माइक्रोमैनेजमेंट’ और नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का यह नतीजा था कि 2014 में राज्य में भाजपा को 42.3 फीसद वोट मिले।
किताब में यह भी खुलासा किया गया है कि 1984 में भाजपा को आम चुनावों में मिली करारी हार के बाद एक सामान्य कार्यकर्ता की तरह जब शाह भाजपा में शामिल हुए तब उन्हें अहमदाबाद के नारनपुरा वार्ड में चुनाव अभिकर्ता के रूप में पहली जिम्मेदारी मिली। इसके अनुसार, वह पहली बार बूथ संख्या 263 सांघवी के प्रभारी बने थे।