बॉम्बे हाईकोर्ट ने अदालत के आदेशों की अनदेखी करने पर सरकारी अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई है। पुणे के दो युवाओं को ऊंचाई में मामूली कमी के कारण सीआईएसएफ/बीएसएफ ट्रेनिंग में शामिल नहीं किया गया था। कोर्ट के आदेश के बाद भी एसएससी निदेशक ने उन्हें शामिल नहीं किया और सुनवाई में भी पेश नहीं हुए।
क्या सरकारी अधिकारियों के मन में अब कानून का कोई डर नहीं बचा है? यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि बॉम्बे हाईकोर्ट ने अदालत के आदेशों की जानबूझकर अनदेखी करने पर कड़ी फटकार लगाई है। हाईकोर्ट ने कर्मचारी चयन आयोग के निदेशक को अदालत के आदेश की अवमानना करने के मामले में सख्त नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने सरकारी अधिकारियों की इस हिम्मत पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि कानून का मजाक बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
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बॉम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस रवींद्र घुगे और जस्टिस हितेन वेनेगांवकर की बेंच ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए अहम टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि आजकल हाई कोर्ट के आदेशों की अनदेखी करना एक आम बात हो गई है। इसी वजह से हर साल राज्य और केंद्र सरकार या उनके अधिकारियों के खिलाफ सैकड़ों अवमानना याचिकाएं दायर की जा रही हैं। अदालत ने SSC निदेशक आरजी सिंह को अवमानना का नोटिस जारी किया है और उन्हें अपना आचरण स्पष्ट करते हुए हलफनामा दायर करने की छूट दी है। मामले की अगली सुनवाई बुधवार को तय की गई है।
आखिर क्या है यह पूरा मामला?
पुणे के रहने वाले दो युवा सुशांत सरोदे और अनिकेत जाधव सीआईएसएफ और बीएसएफ में भर्ती होना चाहते थे।
शारीरिक परीक्षा के दौरान ऊंचाई तय सीमा से थोड़ी कम होने के कारण अधिकारियों ने उन्हें प्रवेश देने से मना कर दिया था।
हाईकोर्ट ने मामले को देखते हुए पाया कि ऊंचाई में यह अंतर बहुत ही मामूली था, इसलिए अदालत ने दोनों को प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल करने का स्पष्ट आदेश दिया था।
कोर्ट के इस साफ आदेश के बावजूद एसएससी के अधिकारियों ने आदेश का पालन नहीं किया और दोनों युवा अब भी ट्रेनिंग में शामिल होने का इंतजार कर रहे हैं।
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कोर्ट ने अधिकारियों के रवैये पर क्या कहा?
अदालत ने कहा कि यह एक ऐसा मामला है जहां देश की सेवा करने वाले अधिकारियों ने भी कोर्ट के आदेश की अवहेलना करने की हिम्मत दिखाई है।
बेंच ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे अधिकारियों के अनुशासन का क्या मतलब है जो कानून की गरिमा का सम्मान नहीं करते हैं।
हाईकोर्ट ने यह भी बताया कि एसएससी निदेशक को अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया गया था।
हालांकि, आदेश मिलने के बावजूद वह अदालत के सामने पेश होने में विफल रहे, जिससे कोर्ट और ज्यादा भड़क गया।
अवमानना याचिकाओं के बढ़ने पर कोर्ट की क्या चिंता?
हाईकोर्ट की बेंच ने इस बात पर हैरानी जताई कि अदालत के आदेशों की अनदेखी करने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। बेंच ने कहा कि यह बेहद चिंताजनक है कि हर साल सैकड़ों अवमानना याचिकाएं कोर्ट में दर्ज की जा रही हैं। अदालत के मुताबिक, इनमें से ज्यादातर मामले राज्य सरकार, केंद्र सरकार या उनके अधिकारियों द्वारा आदेशों की नाफरमानी से जुड़े होते हैं। कोर्ट ने साफ संदेश दिया है कि कानून सर्वोपरि है और इसके आदेशों की अवमानना करने वालों पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।