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बॉम्बे हाईकोर्ट: तेजपाल की रिहाई का आदेश दुष्कर्म पीड़िता के लिए नियम पुस्तिका जैसा

Wed, 02 Jun 2021 03:42 PM IST
गौरव पाण्डेय एजेंसी, पणजी।

सार

बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ ने कहा कि साल 2013 के दुष्कर्म मामले में पत्रकार तरुण तेजपाल को बरी करने का सत्र अदालत का फैसला ‘दुष्कर्म पीड़िताओं के लिए एक नियम पुस्तिका' जैसा है। इसमें यह बताया गया है कि एक पीड़िता को ऐसे मामलों में कैसी प्रतिक्रिया देनी चाहिए।
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तरुण तेजपाल - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच ने बुधवार को यौन उत्पीड़न मामले में तहलका मैगजीन के सहसंस्थापक तरुण तेजपाल को बरी करने वाले सत्र अदालत के आदेश को किसी दुष्कर्म पीड़िता की नियम पुस्तिका बताया। हाईकोर्ट ने रिहाई के खिलाफ गोवा सरकार की अपील पर तेजपाल को नोटिस जारी किया है और 24 जून तक जवाब मांगा है। गोवा की सत्र न्यायालय ने 21 मई को तेजपाल को 2013 में अपने सहयोगी के यौन उत्पीड़न मामले में रिहा कर दिया था। 

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जस्टिस एससी गुप्ता ने सुनवाई के दौरान कहा, सत्र न्यायालय के आदेश में अभियोजन पक्ष के मामले को शामिल ही नहीं किया गया है। जबकि इसमें एक नियम पुस्तिका की तरह बस यह बताया गया है कि दुष्कर्म पीड़िता का व्यवहार कैसा होना चाहिए। उसे यौन उत्पीड़न के बाद किस तरह से बर्ताव करना चाहिए, क्या करने से बचना चाहिए? जज ने कहा, प्रथम दृष्टया रिहाई के खिलाफ दायर अपील पर विचार करने का मामला बनता है।

अत: तेजपाल को नोटिस जारी करने और 24 जून तक जवाब दाखिल करने को कहा जाए। कोर्ट ने साथ ही रजिस्ट्री को सत्र अदालत से इस मामले के सभी दस्तावेजों को मंगाने का भी निर्देश दिया। सत्र न्यायाधीश क्षमा जोशी ने 21 मई को तेजपाल को दोषमुक्त करते हुए कहा था कि पीड़िता के हावभाव से ऐसा नहीं लगता कि उसके साथ यौन उत्पीड़न हुआ। उसने खुद को बचाने का भी कोई प्रयास किया हो इसके कोई साक्ष्य नहीं मिले हैं। गोवा सरकार ने इस आदेश को हाईकोर्ट की गोवा बेंच में चुनौती दी थी। 
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देश इस फैसले को पढ़कर शर्मसार होगा 
गोवा सरकार के वकील सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सत्र अदालत के फैसले के कुछ अंश हाईकोर्ट के सामने रखते हुए कहा, देश जब इस फैसले को पढ़ेगा तो शर्मसार होगा। इसमें कहा गया, पीड़िता जो कि एक बुद्धिमान महिला है और योग प्रशिक्षण होने के कारण शारीरिक रूप से मजबूत है, वह खुदपर हुए यौन हमले को रोक सकती थी। इस मामले की पूरी सुनवाई में पता ही नहीं चला कि मुकदमा आरोपी पर था या पीड़िता पर। पीड़िता के यौन इतिहास पर इतनी अधिक चर्चा हुई जबकि इसकी कोई जरूरत नहीं थी। आदेश में पीड़िता के मोबाइल में इंदिरा जयसिंह जैसी वकीलों के नंबर होने पर भी सवाल उठाए गए। क्या यह आवश्यक था? इस पर हाईकोर्ट के जज गुप्ता ने कहा, वह अगली सुनवाई में इन सभी मुद्दों पर गंभीरता से चर्चा करेंगे। 
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