बॉम्बे हाईकोर्ट ने पुणे की गुरुनानक डेयरी एंड स्वीट्स का लाइसेंस बहाल करने का आदेश देते हुए महाराष्ट्र FDA की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है, लेकिन विभाग को कार्रवाई में संतुलन रखना चाहिए। जून में निरीक्षण के दौरान सफाई और कर्मचारियों की स्वच्छता को लेकर आपत्तियां सामने आने पर दुकान का लाइसेंस निलंबित किया गया था।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार को महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) को कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने पुणे की एक मिठाई की दुकान का लाइसेंस 98 फीसदी अनुपालन रिपोर्ट आने के बावजूद निलंबित रखने पर विभाग को दुकान को पांच लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि खाद्य सुरक्षा को लेकर एफडीए की जांच का उद्देश्य सराहनीय है, लेकिन विभाग "हद से आगे बढ़ रहा है।"
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पुणे की गुरुनानक डेयरी एंड स्वीट्स ने उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल कर एफडीए की कार्रवाई को चुनौती दी थी। दुकान ने कहा कि जून में बंद होने के बाद से उसे 8.74 लाख रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रवींद्र घुगे और न्यायमूर्ति गौतम अंखड़ की पीठ ने खाने-पीने की दुकानों और होटलों के लाइसेंस निलंबित करने की एफडीए की नीति को अजीब और विकृत बताया।
याचिका पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने क्या कहा?
पीठ ने दुकान को दोबारा कारोबार शुरू करने की अनुमति देते हुए विभाग को एक महीने के भीतर मालिकों को पांच लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। अदालत ने कहा, "हमने देखा है कि आपका इरादा सराहनीय है और कम से कम किसी विभाग ने कदम उठाया है। लेकिन आप हद से आगे बढ़ रहे हैं। जब आपने दोबारा जांच की रिपोर्ट में 98 फीसदी अनुपालन पाया, तो आपको तुरंत लाइसेंस का निलंबन रद्द कर देना चाहिए था।"
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क्या है पूरा मामला?
याचिका के अनुसार, 12 जून को एफडीए के एक खाद्य सुरक्षा अधिकारी ने खाद्य विषाक्तता की शिकायत के बाद दुकान का निरीक्षण किया था। निरीक्षण में साफ-सफाई और कर्मचारियों की स्वच्छता को लेकर चिंता जताई गई थी। उसी दिन विभाग ने दुकान का लाइसेंस निलंबित करने का आदेश जारी कर दिया। इसके बाद दुकान ने एफडीए आयुक्त के समक्ष अपील की और अनुपालन रिपोर्ट भी पेश की।
एफडीए ने नहीं बहाल किया था लाइसेंस
13 जुलाई को दुकान का दोबारा निरीक्षण किया गया। इसमें दुकान को 98 फीसदी अनुपालन वाला पाया गया, लेकिन उसका लाइसेंस बहाल नहीं किया गया। दुकान के मालिकों ने इसके बाद एफडीए को निलंबन का आदेश रद्द करने के लिए एक अभ्यावेदन दिया, लेकिन इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने उच्च न्यायालय का रुख किया।