बॉम्बे हाईकोर्ट ने बुधवार को शिवसेना विधायक किरण सामंत की उस जनहित याचिका पर राहत देने से इनकार कर दिया, जिसमें प्रभावशाली लोगों और हास्य कलाकारों द्वारा सोशल मीडिया के कथित दुरुपयोग पर चिंता जताई थी। कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि 'याचिकाकर्ता द्वारा दुरुपयोग को अन्य लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के रूप में देख सकते हैं।'
मुख्य न्यायाधीश आलोक अराधे और न्यायमूर्ति एमएस कार्णिक की पीठ ने कहा कि शिवसेना विधायक सामंत द्वारा मांगी गई राहत सामान्य प्रकृति की है। पीठ ने कहा कि उनके पास सूचना प्रौद्योगिकी नियमों के तहत ऐसी सामग्री को रोकने के लिए नामित नोडल अधिकारी के पास शिकायत दर्ज कराने के लिए एक प्रभावी उपाय उपलब्ध है।
सामंत ने जनहित याचिका में इनको बनाया प्रतिवादी
विधायक सामंत ने जनहित याचिका में प्रभावशाली लोगों, सामग्री निर्माताओं और हास्य कलाकारों द्वारा सोशल मीडिया के दुरुपयोग का आरोप लगाया है। उन्होंने केंद्रीय सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय, गूगल और स्टैंड-अप कॉमेडियन कुणाल कामरा को प्रतिवादी बनाया है।
ये भी पढ़ें: India NOTAM: पहलगाम पर तनाव के बीच भारत का एक और बड़ा कदम, पाकिस्तानी विमानों के लिए बंद किया हवाई क्षेत्र
कामरा की शिंदे पर आपत्तिजनक टिप्पणियों पर हुआ था विवाद
कामरा ने हाल ही में महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे के खिलाफ अपने शो में कथित आपत्तिजनक टिप्पणियां की थीं, जिससे विवाद हुआ और उनके खिलाफ मुंबई सहित कई जगहों पर मानहानि के लिए एफआईआर दर्ज की गई हैं। शिंदे शिवसेना के प्रमुख हैं और याचिकाकर्ता सामंत उनकी पार्टी से हैं।
सामंत ने अपनी याचिका में ये दी दलील
सामंत ने अपनी याचिका में कहा कि वे ऐसी खतरनाक प्रवृत्तियों से परेशान हैं, जहां प्रभावशाली लोग, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में गलत सूचना फैला रहे हैं और न्यायपालिका पर अनुचित हमले कर रहे हैं तथा भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव हिला रहे हैं। याचिका में कामरा के शो के वीडियो में कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों का उदाहरण दिया गया है, जिसे मार्च में अपलोड किया गया था और जिसके बाद विवाद शुरू हो गया।
याचिकाकर्ता जिसे दुरुपयोग मान रहे, वह अन्य के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हो सकता है: अदालत
इस पर मुख्य न्यायाधीश अराधे ने मौखिक रूप से कहा, 'याचिकाकर्ता द्वारा जिसे दुरुपयोग मान रहे हैं, वह अन्य लोगों के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हो सकता है। इसलिए याचिकाकर्ता इसका निर्धारण नहीं कर सकते।' वहीं, कामरा की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील डेरियस खंबाटा ने कहा कि सोशल मीडिया कंटेंट को लेकर पहले से ही शिकायत करने और कार्रवाई कराने की व्यवस्था मौजूद है, जिसमें उचित चैनलों के माध्यम से ऐसी सामग्री को अवरुद्ध करने की मांग करना शामिल है।
ये भी पढ़ें: प्रगति बैठक: PM मोदी ने 90000 करोड़ रुपये की परियोजनाओं की समीक्षा की, बायोमेट्रिक्स से लाभार्थियों की पहचान के दिए आदेश
सामंत ने वैधानिक उपायों का इस्तेमाल नहीं किया: अदालत
अदालत ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 और 2009 के अवरोधन नियमों के प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि सामंत ने उन वैधानिक उपायों का इस्तेमाल नहीं किया। इसके बजाय अदालत से व्यापक रूप से शब्दों में निर्देश मांगे, जिन्हें प्रदान नहीं किया सकता। मुख्य न्यायाधीश ने सुझाव दिया कि सोशल मीडिया पर नजर रखने के लिए सेंसरशिप और सतर्कता समिति गठित करने का सत्तारूढ़ पार्टी के विधायक का अनुरोध नीति निर्माण के दायरे में आता है। ये सब नीति बनाने का मामला है, जो सरकार का काम है, अदालत का नहीं। पीठ ने कहा, 'याचिकाकर्ता खुद एक विधायक हैं। अगर उन्हें ऐसा करने की सलाह दी जाती है तो वे उचित कार्रवाई कर सकते हैं।'
संबंधित वीडियो