बॉम्बे हाईकोर्ट ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की जेड-प्लस सुरक्षा पर खर्च वसूली की मांग वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। नागपुर निवासी ललन सिंह ने याचिका में कहा था कि भागवत को दी जा रही जेड-प्लस सुरक्षा पर हर महीने करीब 40 से 45 लाख रुपये खर्च हो रहे हैं, जो टैक्सपेयर्स के पैसे का गलत इस्तेमाल है।
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बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर पीठ ने सोमवार को उस जनहित याचिका (पीआईएल) को खारिज कर दिया, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत को दी गई जेड-प्लस सुरक्षा की लागत उन्हीं से वसूलने की मांग की गई थी। मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति अनिल किलोर की खंडपीठ ने याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता की मंशा और इरादे पर गंभीर सवाल उठाए।
याचिकाकर्ता ने क्या की थी मांग?
नागपुर निवासी ललन सिंह द्वारा दायर इस याचिका में दावा किया गया था कि आरएसएस एक पंजीकृत संगठन नहीं है, इसलिए उसके प्रमुख को सरकारी खर्च पर सुरक्षा देना करदाताओं के पैसे का दुरुपयोग है। याचिकाकर्ता के अनुसार, भागवत की सुरक्षा पर हर महीने लगभग 40 से 45 लाख रुपये खर्च होते हैं, जिससे सरकारी खजाने को नुकसान हो रहा है। याचिका में मांग की गई थी कि सरकार इस पूरी राशि की वसूली स्वयं मोहन भागवत से करे।
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भागवत को कब मिली थी सुरक्षा?
जून 2015 में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की सुरक्षा को बढ़ाकर जेड-प्लस श्रेणी में बदला गया था, वहीं उनका सुरक्षा घेरा सीआईएसएफ के पास है। इससे पहले मोहन भागवत की सुरक्षा में महाराष्ट्र पुलिस के जवान तैनात थे।
मुकेश अंबानी पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलै का उल्लेख
अपनी दलीलों के समर्थन में याचिकाकर्ता ने उद्योगपति मुकेश अंबानी से जुड़े 2023 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया था। उस मामले में शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया था कि अंबानी को सरकारी नीति के अनुसार सुरक्षा दी जाए, लेकिन उसका पूरा खर्च उनके परिवार द्वारा वहन किया जाएगा। हालांकि, हाई कोर्ट ने इस तर्क को इस मामले में स्वीकार नहीं किया और याचिका को अनुचित मानते हुए हटा दिया।