बंबई उच्च न्यायालय ने उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ और केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू के खिलाफ जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। दोनों के खिलाफ न्यायपालिका और न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम प्रणाली पर टिप्पणी को याचिका दायर की गई थी।
बॉम्बे लॉयर्स एसोसिएशन द्वारा दायर याचिका में दावा किया गया था कि रिजिजू और धनखड़ ने अपनी टिप्पणियों और आचरण से संविधान में विश्वास की कमी दिखाई है। एसोसिएशन ने मांग की थी कि उपराष्ट्रपति धनखड़ व कानून मंत्री रिजिजू को आधिकारिक कर्तव्यों का निर्वहन करने से रोका जाए और घोषित किया जाए कि दोनों अपने सार्वजनिक आचरण और उनके बयानों के माध्यम से भारत के संविधान में विश्वास की कमी दिखाते हुए अपने संवैधानिक पदों को धारण करने से अयोग्य हैं।
क्या है पूरा मामला?
पिछले दिनों जयपुर में आयोजित एक कार्यक्रम को उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने न्यायपालिका पर कड़ी टिप्पणी की थी। धनखड़ ने कहा था कि संसद के बनाए कानून को किसी और संस्था द्वारा अमान्य किया जाना लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2015 में एनजेएसी अधिनियम को निरस्त किए जाने को लेकर उन्होंने यह भी कहा कि 'दुनिया में ऐसा कहीं नहीं हुआ है। उपराष्ट्रपति बोले, 'संविधान में संशोधन का संसद का अधिकार क्या किसी और संस्था पर निर्भर कर सकता है?
रिजिजू ने क्या कहा था?
इसी तरह कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने भी कई बार सुप्रीम कोर्ट पर टिप्पणी की थी। वह लगातार सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति की कॉलेजियम पर सवाल उठाते रहे हैं। इन्हीं मुद्दों को उठाते हुए बॉम्बे लॉयर्स एसोसिएशन की ओर से बॉम्बे हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई है। इसमें मांग की गई है कि उच्च न्यायालय उपराष्ट्रपति धनखड़ व कानून मंत्री रिजिजू को आधिकारिक कर्तव्यों का निर्वहन करने से रोके और घोषित करे कि दोनों अपने सार्वजनिक आचरण और उनके बयानों के माध्यम से भारत के संविधान में विश्वास की कमी दिखाते हुए अपने संवैधानिक पदों को धारण करने से अयोग्य हैं।