महाराष्ट्र की राजनीति क्रिकेट की तरह अनिश्चितताओं का खेल बनती जा रही है। कभी सच्ची यार रहीं दोनों प्रमुख पार्टियां शिवसेना-भाजपा अब अपने-अपने रास्ते जाते दिखाई दे रही हैं। बीएमसी चुनाव में पूर्ण बहुमत न मिलने के बाद अब दोनों पार्टियां नए-नए समीकरण बनाने में लगी हैं। खबरों की मानें तो बीएमसी चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी शिवसेना कांग्रेस से हाथ मिला सकती है।
हालांकि केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने शुक्रवार को सुलह के संकेत दिए थे। उन्होंने कहा थी कि यदि शिवसेना भाजपा पर हमला बोलना बंद कर दे तो बात बन सकती है। लेकिन उसके अगले दिन शनिवार को शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना में भाजपा पर फिर से हमला बोला। सामना में बीजेपी को गुंडों की पार्टी बताया गया।
इन सब हलचलों के बाद नए समीकरण पर नजर डालें तो आंकड़े कुछ और ही कहते हैं। इन आंकड़ों का सीधा असर महाराष्ट्र की फडणवीस सरकार पर भी पड़ सकता है।
288 सीटों वाली महाराष्ट्र विधानसभा में बीजेपी के पास सबसे ज्यादा 122 सीटें और शिवसेना के पास 63 सीटें हैं। ऐसे में यदि शिवसेना बीएमसी में कांग्रेस से हाथ मिलाती है तो महाराष्ट्र की राजनीति में एक नया मोड़ आ सकता है। जिस तरह का रुख शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने अपनाया हुआ है उससे तो लगता है कि शिवसेना-भाजपा में बात बनने वाली नहीं है।
राज्य में सरकार बनाने के लिए किसी भी पार्टी को 145 सीटें चाहिए हैं। यदि शिवसेना भाजपा की फडणवीस सरकार से समर्थन वापस लेती है तो राज्य में नए समीकरण बनेंगे और भाजपा की सरकार गिर सकती है।
आंकड़ों पर नजर डालें तो शिवसेना 63 सीटों के साथ महाराष्ट्र की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है। विश्लेषकों की मानें तो बीएमसी में कांग्रेस से साथ गठबंधन होने पर शिवसेना राज्य की फणनवीस सरकार से समर्थन वापस ले लेगी। हालांकि सरकार बचाने के लिए भाजपा के पास भी विकल्प हैं।
यदि दोनों पार्टियों का गठबंधन टूटता है तो भाजपा एनसीपी (राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी) से हाथ मिला सकती है। एनसीपी के पास 41 विधायक हैं। हालांकि अभी इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता।
राजनीतिक पार्टियां अपने-अपने समाकरण बनाने में लगी हैं। वैसे मुंबई के मेयर का कार्यकाल 8 मार्च को समाप्त हो रहा है। तो संभवतः 9 मार्च को इन सभी अटकलों पर विराम लग सकता है।