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उत्तराखंड की सफलता से उत्साहित BJP उसी तर्ज पर लड़ेगी हिमाचल में विधानसभा चुनाव

Thu, 03 Aug 2017 10:22 PM IST
संजय मिश्र, अमर उजाला ब्यूरो
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पीएम मोदी - फोटो : indian express
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हिमाचल से भाजपा को मिल रहे सुनहरे संकेतों से पार्टी आलाकमान को इस बात का विश्वास हो चला है कि प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में उसकी ऐतिहासिक जीत होगी। यही वजह है कि चेहरा आगे करने की कवायद को किनारे करते हुए भाजपा आलाकमान ने हिमाचल विधानसभा का चुनाव भी उत्तराखंड की तर्ज पर सामूहिक नेतृत्व में चुनावी मैदान में उतरने का मन बनाया है। मगर सूत्र बताते हैं कि चुनाव बाद के चेहरे के रूप में भी स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ही पार्टी आलाकमान की पसंद हैं। बीते दिनों प्रदेश का दौरा कर लौटे भाजपा के एक राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री ने अमर उजाला को बताया कि हिमाचल का चुनाव भी उत्तराखंड की तर्ज पर होगा। चेहरा आगे करने के बजाय पार्टी सामूहिक नेतृत्व में ही चुनाव मैदान में उतरेगी।
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वहीं, सूबे के अगले मुख्यमंत्री के नाम पर उक्त महामंत्री ने बताया कि वैसे तो मामले में अंतिम निर्णय पीएम मोदी और अमित शाह को लेना है। मगर हिमाचल के अगले नेतृत्व के रूप में पार्टी की दिशा जेपी नड्डा की तरफ ही है। दरअसल नड्डा को भाजपा अध्यक्ष शाह की पसंद माना जाता है। नड्डा को हिमाचल भाजपा की कमान देकर उन्हें प्रदेश में भेजने का मन शाह ने फरवरी माह में ही बना लिया था। मगर प्रदेश भाजपा नेताओं के बीच जारी सिर-फुट्टौव्वल और इस बीच उत्तराखंड में मिली पार्टी को भारी सफलता के बाद शाह ने अपने मन को कुछ दिनों के लिए बदला है। अब भाजपा चुनाव परिणाम के बाद ही हिमाचल में अपने मुख्यमंत्री के उम्मीदवार का ऐलान करेगी। ताकि पार्टी के चुनावी अवसर पर कोई मुश्किल पैदा न हो सके। 

चेहरा सामने न करने में शाह की क्या है मजबूरी?

हिमाचल की भौगोलिक दशा पर्वतीय होने के बावजूद भी भाजपा को वर्ष के अंत में होने वाले प्रदेश विधानसभा के चुनाव में अपनी राह आसान दिख रही है। पार्टी आलाकमान के जरिए कराए गए सूबे के जमीनी सर्वे में भाजपा को 50 से ज्यादा सीटें मिलने का अनुमान है। बावजूद उसके भाजपा आलाकमान चेहरा सामने करने से बच रहा है। शाह की मजबूरी है यह है कि उत्तराखंड की तरह हिमाचल की राजनीति भी जातीय और पार्टी नेताओं के आपसी झगडे में फंसी हुई है। नेतृत्व को लेकर एकजुटता नहीं है। सांसद शांता कुमार और पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के बीच पहले ही प्रदेश में भाजपा की स्थिति कई बार चौपट हो चुकी है। अब दोबारा से भाजपा आलाकमान ऐसे किसी नौबत से बचाना चाह रहा है। अब बढ़ती उम्र के वजह से शांता कुमार बेशक मुख्यमंत्री उम्मीदवार की दौड़ से बाहर हैं, पर धूमल के साथ उनके रिश्ते सुनहरे नहीं है। इस बीच केंद्रीय की राजनीति में जेपी नड्डा एक बड़ा चेहरा बनकर उभरे हैं। अब धूमल की पेंच नड्डा से फंसी हुई है। सूत्र बताते हैं कि नड्डा के नाम की चर्चा सुन धूमल ने पीएम मोदी के यहां अपने राजनीतिक अस्तित्व की गुहार लगाई है। तो उनके पुत्र अनुराग ठाकुर ने वित्त मंत्री अरूण जेटली के जरिए नड्डा की राह में रोड़ा अटकाने की कवायद की है। बावजूद इसके नड्डा भारी पड़ते दिख रहे हैं। बताया जा रहा है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का उनपर भरोसा बढ़ा है। 
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नड्डा और धूमल की लडाई में अन्य नेता भी देख रहे मुख्यमंत्री पद पर आसीन होने के सपने 

नड्डा और धूमल के बीच नेतृत्व को लेकर जारी सियासी जंग के बीच प्रदेश के तमाम कई नेता भी सूबे का अगला मुख्यमंत्री बनने का सपना पालने में लगे हैं। इनमें सबसे पहला नाम पूर्वोत्तर के संगठन महामंत्री अजय जामवाल का है। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की तरह वे भी हिमाचल का मुख्यमंत्री बनना चाह रहे हैं। हालांकि इस बात की संभावना बेहद कम है कि भाजपा दोबारा से कोई ऐसा प्रयोग लागू करे। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सतपाल सत्ती भी दो वरिष्ठ नेताओं की जंग में अपने लिए सुनहरा अवसर मान रहे हैं। इसके लिए परदे के अंदर उनके प्रयास भी जारी हैं। तो पूर्व भाजपा अध्यक्ष जयराम ठाकुर और विधायक एवं पूर्व मंत्री राजीव बिंदल सूबे के अगले मुख्यमंत्री की बाजी अपने हाथ करने के प्रयास में जुटे हैं। लेकिन इन नेताओं के तमाम प्रयासों के बावजूद बाजी नड्डा के ही हाथों में जाती दिख रही है।

जातीय समीकरण भी है नड्डा के पक्ष में 

हिमाचल प्रदेश से सटे उत्तराखंड में त्रिवेंद्र रावत के रूप में ठाकुर नेता को मुख्यमंत्री की कमान भाजपा पहले ही दे चुकी है। इसके बाद यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ भी ठाकुर बिरादरी से हैं। भाजपा शासित अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों में भी ठाकुर बिरादरी का ही बोलबाला है। छत्तीसगढ के रमन सिंह हों या राजस्थान की वसुंधरा राजे ये दोनों ही नेता राजपूत बिरादरी से हैं। जबकि जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री का पद भी भाजपा ने ठाकुर नेता के रूप में निर्मल सिंह को थमा रखी है। पूरे उत्तर भारत की राजनीति में भाजपा ने किसी ब्राहण नेता को मुख्यमंत्री सरीखा महत्वपूर्ण प्रदान नहीं किया है। इसलिए भाजपा आलाकमान की यह मजबूरी भी है कि हिमाचल की कमान किसी ब्राहण नेता के हाथ सौंपे, ताकि उत्तर भारत में बड़े वोट बैंक के रूप में व्याप्त ब्राहण बिरादरी को भाजपा 2019 के लिए अपने साथ रख सके। वैसे भी यह बिरादरी भाजपा के परंपरागत वोटों के रूप में मानी जाती है। यही वजह है कि हिमाचल में अगले मुख्यमंत्री के रूप में नड्डा की राह बेहद आसान नजर आ रही है। ब्राहण बिरादरी का होने के साथ वे संघ के भी चहेते माने जाते हैं। संघ के संगठन अखिल भारतीय विधार्थी परिषद से राजनीतिक पारी की शुरूआत करने वाले नड्डा पर पीएम मोदी समेत भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का भी भरोसा प्राप्त है। उनका शांत स्वभाव भी उनकी पूंजी माना जाता है। जबकि उनके सामने चुनौती बन रहे नेता किसी न किसी मायने में उनसे पीछे ही दिखाई दे रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि चेहरे को लेकर सर्वे में आए नामों में भी नड्डा का नाम ही पसंद के रूप में ज्यादा उभर कर आ रहा है। उनके बाद प्रेम कुमार धूमल जनता की पसंद हैं। धूमल की राह में सबसे बड़ा रोड़ा उनकी बढ़ती उम्र बताई जा रही है। 73 वर्ष के धूमल को कमान सौंप कर भाजपा पीएम मोदी के जरिए 75 वर्ष के तय उम्र की सीमा की अवहेलना भी नहीं करना चाहेगी। हालांकि धूमल को सम्मान देते हुए भाजपा उनके पुत्र अनुराग ठाकुर का कद राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ा सकती है।
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