अगर कोई अरुण जेटली को महज कानून का जानकार कहता है तो इसका मतलब है कि वह उन्हें अच्छे से नहीं जानता। वे इससे परे एक मददगार इंसान भी थे। सार्वजनिक जीवन में वे इतने व्यावहारिक थे कि हर कोई उन जैसा नहीं बन सकता। सरकार और विपक्ष के बीच जेटली पुल का काम करते रहे हैं। भाजपा में तो जेटली का जटिल कामों से गहरा रिश्ता रहा है।
बहुत से लोग ऐसा सोचते रहे हैं कि अरुण जेटली तो बड़े व्यक्ति हैं, उनके साथ हम कैसे बातचीत करेंगे। यदि बातचीत का मौका मिल भी जाए तो उस दौरान कैसे शब्दों का इस्तेमाल करना होगा। प्रभात झा के मुताबिक, यह सोच उन सांसदों की भी रही है जो पहली बार चुनकर संसद में पहुंचे थे। अब इसका दूसरा पहलू देखिए, जो व्यक्ति उक्त सोच के साथ जब उनसे मिलता था तो वह जेटली के बारे में स्वयं की सोच पर हैरान होता था। वजह, जेटली जी इतने सहज और हास्य भाव के साथ लोगों से मिलते थे कि सामने वाला उन्हें जीवनभर भूलता नहीं था।
जेटली का यही व्यवहार उन्हें विपक्षी नेताओं के बीच भी लोकप्रिय बनाए रखता था। वे सदन में हंसकर विपक्षी नेताओं से पूछ लेते थे कि आप बता दो, हमें क्या करना है। सदन में उनका संवाद ऐसा होता था कि लोग उन्हें सुनते थे। तबीयत खराब होने की वजह से कभी जेटली को सदन में बैठकर बोलना पड़ा तो सदन में मौजूद अधिकांश सदस्य खड़े होकर उनकी बात पर गौर करते थे। उनका चले जाना न केवल भारतीय राजनीति, बल्कि संसद के लिए भी बड़ा झटका है।
प्रभात झा कहते हैं कि अरुण जेटली अपने सार्वजनिक जीवन में बहुत ईमानदार रहे हैं। उनके घर या दफ्तर में जो कोई भी निजी तौर पर काम करता तो वे उसे चेक से वेतन देते थे। यहां तक कि ड्राइवर और रसोईये को भी चेक के जरिए सैलरी मिलती थी। छोटी से छोटी खरीद का भी बिल जरूर लेते थे। इसके अलावा अरुण जेटली में गजब का सेंस ऑफ ह्यूमर था। विपक्षी नेता भी इसके कायल थे। सदन में कभी टेंशन का माहौल होता तो वे तुरंत अपने हास्यभाव से माहौल को हंसमुख बना देते थे।
मणिपुर की राज्यपाल नजमा हेपतुल्ला ने अरुण जेटली को सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच एक पुल का काम करने वाली शख्सियत बताया है। बड़ी बात यह रही कि उन पर जितना भरोसा सत्तापक्ष को रहता, वैसी ही तव्वजो विपक्ष भी उन्हें देता था। सदन में लंच के बाद उनके कमरे में भीड़ लग जाती थी। सदन के सदस्य, मीडियाकर्मी और उनसे मिलने वाले अन्य लोग भी बिना किसी रोक टोक के वहां पहुंचते थे।