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केंद्र को किसान आंदोलन के सियासी आंच से बचाने में जुटी भाजपा

Thu, 15 Jun 2017 08:53 PM IST
संजय मिश्र, नई दिल्ली
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किसान आंदोलन - फोटो : ie
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किसान आंदोलन पर केंद्र सरकार बेशक मौन है। मगर आंदोलन ने सरकार के रणनीतिकारों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। सरकार के रणनीतिकार किसान आंदोलन की आंच से केंद्र को बचाने में जुटे हुए हैं। इस प्रयास में किसान आंदोलन से निपटने का जिम्मा पूरी तरह राज्यों के भरोसे छोड दिया गया है। सरकार को लगता है कि मामला केंद्र से जुडने के बाद किसानों का आक्रोश देशव्यापी मुद्दा बन जाएगा। इससे केंद्र सरकार की ही मुसिबतें बढेंगी। यही वजह है कि पीएमओ ने सरकार के मंत्रियों को स्पष्ट निर्देश देकर बयानबाजी से दूरी बरतने का फरमान जारी कर रखा है। मध्यप्रदेश के पूरे किसान आंदोलन के दरम्यान केवल केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू का ही बयान दिखा।
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सूत्र बताते हैं कि नायडू के बयान के बाद ही पीएमओ की ओर से इस आशय के फरमान जारी किए गए कि केंद्र सरकार का कोई भी मंत्री इस मामले में बयान नहीं देगा।  मामला राज्य का है इसलिए राज्य सरकार इससे निपटेगी। बल्कि कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह को भी बयान से दूर रखा गया। यही नहीं महाराष्ट्र सरकार के कृषि कर्ज माफी के फैसले के तुरंत बाद ही वित्त मंत्री अरूण जेटली ने स्पष्ट किया कि कर्ज माफी का फैसला केंद्र का नहीं है। राज्य चाहें तो अपनी सहूलियत से कदम उठा सकते हैं। हालांकि परदे के पिछे से राज्यों को दिल्ली से संदेश जाते रहे।

रणनीति के तहत स्थगित हुई राधा मोहन की पत्रकार वार्ता 
तीन साल की उपलब्ध्यिों को लेकर 7 जून को कृषिमंत्री राधा मोहन सिंह की प्रस्तावित पत्रकार वार्ता रणनीति के तहत स्थगित की गई थी। बताया जा रहा है कि सरकार के शीर्ष स्तर से सिंह को पत्रकार वार्ता स्थगित करने का फरमान जारी किया गया था। इसके अलावा ठीक तीन बाद मध्य प्रदेश के बुधनी में आयोजित कृषि मंत्रालय के कार्यक्रम को भी स्थगित किया गया। हालांकि रामदेव के योग कार्यक्रम के वजह से भद्द पिटने और अण्डा फेंके जाने की घटना के बाद राधा मोहन ने मध्य प्रदेश के किसानों की मृत्यु पर दु:ख जताया था। 
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किसान आंदोलन की आंच से पीएम मोदी को बचाने की कवायद
किसान आंदोलन को राज्यों के भरोसे छोडने के केंद्र की रणनीति को पीएम मोदी को किसान आंदोलन की सियासी आंच से बचाने की कवायद के रूप में देखा जा रहा है। सरकार के रणनीतिकारों का मानना है कि भूमि अधिग्रहण बिल और सूटबूट के आरोपों से पीएम मोदी का पीछा बडी मुश्किल से ही छूट पाया है। यदि किसान आंदोलन की सियासी आंच में केंद्र सरकार तक पहुंची तो सीधा नुकशान पीएम मोदी की छवि को होगा।

नोटबंदी, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना सरीखे तमाम कदमों के बाद पीएम मोदी की छवि गरीब—किसान हितैषी नेता के रूप में बनी है। मगर पार्टी शासित राज्यों से ही आंदोलन के रूप में उभरे किसान असंतोष को पार्टी और सरकार के शीर्ष नेता भी बडी चुनौती मान रहे हैं। यही वजह है कि किसान आंदोलन के मुद्दे को राष्ट्रीय मुद्दा बनने और लंबा खिंचने से पहले ही केंद्र ने आंदोलन को राज्यों के जरिए ही नियंत्रित करवाने का प्रयास किया है। ताकि पीएम मोदी को किसान आंदोलन की सियासी आंच से महफूज रखा जा सके। राज्यों के जरिए ही किसान हितैषी कदम उठाए गए। बल्कि किसानों की कर्ज का ब्याज घटाने का फैसला लेकर केंद्र ने पीएम मोदी की किसान हितैषी छवि को और पुख्ता बनाने का प्रयास किया है। 
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