अमित शाह ने संकल्प पत्र जारी करते हुए इस बात को दोहराया कि उनकी सरकार आने पर ऐसे कानून बनाए जाएंगे जो आदिवासियों की जमीनों को उन्हें वापस दिलाने का काम करेंगे। उन्होंने कहा कि यह कानून पिछली तारीखों से लागू होंगे। यानी जिनकी जमीन किसी गलत तरीके से पहले भी किसी ने ले लिया है तो यह जमीन उन्हें वापस दिलाई जाएगी। आदिवासी बहुल झारखंड में यह मुद्दा संवेदनशील बन सकता है।
वरिष्ठ पत्रकार धीरेंद्र कुमार ने अमर उजाला से कहा कि आदिवासी समुदाय के बीच जमीन और जंगल बेहद संवेदनशील मुद्दा है। इसके लिए आदिवासी लोग कुछ भी करने के लिए तैयार रहते हैं। चूंकि भाजपा ने अपने चुनाव प्रचार में इस मुद्दे को लगातार हवा दी है, इस चुनाव में यह एक संवेदनशील मुद्दा बन सकता है। चूंकि भाजपा,
जहां तक बांग्लादेशी घुसपैठियों को झारखंड से बाहर निकालने की बात है, यह चुनावी जुमला ज्यादा लग रहा है। क्योंकि दिल्ली में जहां की कानून-व्यवस्था केंद्र सरकार के हाथ में है, वहां से भी सरकार उन्हें बाहर नहीं निकाल पाई है। ऐसे में वह यह वादा झारखंड में कैसे पूरा कर पाएगी, यह कहना मुश्किल है। चूंकि ऐसे घुसपैठियों में कई के वैवाहिक संबंध यहां के आदिवासियों से हो चुके हैं, उनके पास कई वैधानिक दस्तावेज भी हैं, उन्हें बाहर निकालना आसान नहीं होगा।
रेवड़ी पर दोनों को विश्वास
प्रधानमंत्री मुफ्त योजनाओं को फ्री की रेवड़ी कहकर इसको गलत ठहराते रहे हैं, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी अपनी पार्टी को उतना ही वादा करने की बात कही है जितनी पूरी की जा सके, लेकिन इसके बाद भी झारखंड में भाजपा और झामुमो-कांग्रेस ने मुफ्त की योजनाओं पर ही जमकर भरोसा किया है।
भाजपा ने पहले ही पंच प्रण की घोषणा कर दी थी। आज ये पंच प्रण पार्टी के संकल्प पत्र में भी दिखाई दिए। इसमें राज्य के युवाओं को रोजगार देना, पांच सौ रुपये में सिलेंडर देना और गोगो दीदी योजना के अंतर्गत महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण करना शामिल है।
हालांकि, आदिवासी पहचान को अपनी ताकत बना चुके हेमंत सोरेन को भाजपा कितनी पटखनी दे पाएगी, कहना आसान नहीं है। हेमंत सोरेन ने अपनी गिरफ्तारी को आदिवासी अस्मिता पर हमला करार दिया है। उनकी पत्नी कल्पना सोरेन अपनी सभाओं में लगातार इसी मुद्दे को हवा दे रही हैं। यदि आदिवासी जनता इस मुद्दे पर भावनात्मक रूप से जुड़ गई तो भाजपा के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं।