हालिया सियासी उठापटक बता रही है कि 2019 आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के लिए हालात कितने विकट रहने वाले हैं। भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए का कुनबा लगातार सिमटता जा रहा है। कुछ बड़े दल भाजपा से अलग हो चुके हैं और कुछ दल भाजपा से बेहद नाराज हैं। इसका सीधा असर 2019 के आम चुनाव में पड़ सकता है। बिहार में राष्ट्रीय लोक समता पार्टी और उत्तर प्रदेश में सुहेलदेव भारत समाज पार्टी की भाजपा से नाराजगी ने मुश्किलों में और इजाफा किया है।
2019 का संग्राम
पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद 2019 का संग्राम शुरू हो जाएगा। विधानसभा चुनावों के परिणाम 2019 का सियासी मूड सेट करेंगे। खास तौर पर मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ चुनाव के नतीजे बताएंगे कि आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली एनडीए की सत्ता वापसी की कितनी संभावना बनती है। जिस तरह से भाजपा के सहयोगी उसका साथ लगातार छोड़ रहे हैं, उससे तो फिलहाल पार्टी के सामने मुश्किल खड़ी हो गई है।
बिहार-यूपी की उठापटक
बिहार और यूपी की उठापटक बता रही है कि भाजपा के लिए हालात कितने विकट हैं। बिहार में उपेंद्र कुशवाह की अगुवाई वाली राष्ट्रीय लोक समता पार्टी और उत्तर प्रदेश में ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारत समाज पार्टी के रुख ने भाजपा के लिए परेशानी खड़ी कर दी है। हालांकि, दोनों दल छोटे हैं लेकिन इसके मायने गहरे हैं। दोनों ने अभी तक एनडीए से अलग होने का एलान तो नहीं किया है लेकिन इनकी नाराजगी साफ देखी जा सकती है। अगर भाजपा इन्हें मनाने में नाकाम रहती है तो लोकसभा चुनाव में पार्टी को इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है।
बड़े दल हुए नाराज
एनडीए में करीब 40 पार्टियां हैं लेकिन अधिकतर छोटी पार्टियां हैं। इनमें से करीब 14 पार्टियों के पास ही सांसदों की अच्छी संख्या हैं। भाजपा की एक महत्वपूर्ण सहयोगी रही तेलुगुदेशम पार्टी पहले ही एनडीए से अलग हो चुकी है। चंद्रबाबू नायडू तीसरा मोर्चा बनाने की जुगत में लगे हैं। भाजपा की सबसे पुरानी सहयोगी शिवसेना भी उससे बेहद नाराज है और अलग लड़ने का संकेत दे चुकी है। हालांकि महाराष्ट्र में अब भी दोनों दल मिलकर सरकार चला रहे हैं। पीएम नरेंद्र मोदी पर शिवसेना के आए दिन होने वाले सियासी हमले बता रहे हैं कि इनके रिश्ते किस दौर में पहुंचे चुके हैं।