दरअसल लोकसभा चुनाव से पहले छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्यप्रदेश और लोकसभा के चुनाव के बाद हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड में स्थानीय नेतृत्व की अलोकप्रियता पार्टी पर भारी पड़ गई। पार्टी चुनाव से पहले जिन छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्यप्रदेश की सत्ता गंवाई, वहां लोकसभा चुनाव में करीब करीब क्लीन स्वीप किया।
चुनाव बाद लोकसभा की तुलना में झारखंड और हरियाणा में क्रमश: 18 और 22 फीसदी वोट घटे। जबकि महाराष्ट्र में 8 फीसदी वोट कम हो गए। प्रदर्शन की समीक्षा में पाया गया कि ऐसा इन राज्यों के नेतृत्व की अलोकप्रियता और अकर्मण्यता के कारण हुआ। अब पार्टी नहीं चाहती कि आने वाले दो-तीन सालों में जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव है, वहां पार्टी को स्थानीय नेतृत्व के कारण सियासी झटका सहना पड़े।
वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में अपने दम पर पहली बार बहुमत हासिल करने वाली भाजपा के वोट इसके तत्काल बाद हुए विधानसभा चुनाव में भी कम हुए थे। हालांकि यह गिरावट महज 5 फीसदी के आसपास थी। मगर इस लोकसभा चुनाव के बाद वोट प्रतिशत में 22 फीसदी तक की बड़ी गिरावट दर्ज की गई। हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड में केंद्रीय नेतृत्व की ओर से पांच साल तक लगातार मिले फ्री हैंड के बावजूद सीएम अपना जादू नहीं दिखा सके। उल्टे सीएम की नकारात्मक छवि का पार्टी को नुकसान झेलना पड़ गया।
सभी राज्यों पर अलग-अलग होगा मंथन
मंथन पार्टी और गठबंधनशासित सभी 16 राज्यों पर होगा। गठबंधन शासित राज्यों में डिप्टी सीएम और वरिष्ठ मंत्रियों की समीक्षा होगी तो पार्टीशासित राज्यों में सीएम और डिप्टी सीएम की। इस दौरान बेहतर प्रदर्शन और हालात संभालने की गुंजाइश पर भी मंथन होगा।