लोकसभा चुनाव में बड़ी जीत से गदगद भाजपा इस बार दिल्ली में भी अपना झंडा गाड़ने की तैयारी कर रही है। उसे उम्मीद है कि दिल्ली की सत्ता से उसका 21 साल का सूखा इस बार नरेंद्र मोदी लहर में खत्म हो जाएगा। लेकिन दिल्ली में पार्टी के लिए अनुकूल परिस्थिति होने के बाद भी प्रदेश स्तर के नेताओं के बीच गुटबाजी जारी है। यह उसे पिछली बार की तरह महंगी पड़ सकती है जब नरेंद्र मोदी को 2014 के लोकसभा चुनाव में मिली बड़ी जीत के बाद साल भर के भीतर हुए दिल्ली के विधानसभा चुनाव में उसे करारी हार का सामना करना पड़ा था।
दरअसल, दिल्ली प्रदेश भाजपा इस समय दो खेमों में बंटी हुई है। एक खेमे में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी और उनके साथी नेता हैं तो दूसरे खेमे में विजय गोयल, विजेंद्र गुप्ता, रमेश बिधूड़ी और डॉक्टर हर्षवर्धन जैसे दिल्ली के नेताओं का गुट है जो मनोज तिवारी को अभी तक प्रदेश अध्यक्ष के रूप में स्वीकार नहीं कर पाया है। पार्टी नेताओं के बीच जारी यह गुटबाजी लोकसभा चुनाव के पूर्व भी एक बार सतह पर आ गई थी। तब चुनाव में दिल्ली के विशेष प्रभारी बनाये गये अरुण सिंह ने बीच में दखल देकर इसे खत्म करने की कोशिश की थी, लेकिन अब विधानसभा चुनाव के समय यह गुटबाजी एक बार फिर तेज हो गई है। दोनों गुटों की निगाह दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की कुर्सी पर बताई जाती है।
अलग-अलग राह पर मनोज तिवारी और विजय गोयल
दिल्ली भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी का अपना स्टारडम है। इस भोजपुरी गायक और अभिनेता की दिल्ली की पूर्वांचली जनता पर अच्छी पकड़ है। लोकसभा चुनाव में दिल्ली की सातों सीटें जीतकर पार्टी को देने के बाद भी वे रुके नहीं हैं और लगातार झुग्गी-झोपड़ियों में रात्रि प्रवास कर जनता से जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं। उनका दावा है कि नरेंद्र मोदी की लहर में भाजपा दिल्ली की 70 में 60 सीटें जीतेगी। उनके मन में भी दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने की तमन्ना है जो केंद्रीय नेताओं की ‘कृपा’ से ही संभव है। यही कारण है कि दिल्ली की जनता में पैठ बनाने के साथ-साथ वे लगातार अमित शाह का स्वागत करते हुए देखे जा रहे हैं।
वहीं, प्रदेश के डॉक्टर हर्षवर्धन के केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री बनने के बाद उनके प्रदेश में आने की संभावनाएं कम हो गई हैं। दूसरे नेता विजय गोयल दिल्ली प्रदेश की राजनीति के कद्दावर नेता हैं। प्रदेश में कार्यकर्ताओं से लेकर पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारियों तक उनकी अच्छी पकड़ है। अपने अनुभव और जमीनी पकड़ के दम पर वे भी दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने का सपना पाले हुए हैं। लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी न होते हुए भी उन्होंने चुनाव के दौरान लगातार अपनी सक्रियता बनाये रखी और पार्टी को जिताने में अपना अहम रोल निभाया। इस समय भी वे अनेक जनसंपर्क के कार्यक्रम कर केंद्रीय नेतृत्व की निगाह में प्रदेश में अपनी दावेदारी मजबूत करने का काम कर रहे हैं।
लेकिन यह सब करते हुए वे प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी से पूरी तरह अलग-थलग देखे जा रहे हैं और दोनों ही नेता एक दूसरे के कार्यक्रमों में नहीं जा रहे हैं और अलग-अलग कार्यक्रम कर रहे हैं। यहां तक कि अरविंद केजरीवाल सरकार पर हमला करने में भी दोनों अलग-अलग हमलावर हैं। इससे दोनों नेताओं के बीच तनाव ज्यादा बढ़ने के कयास लगाये जा रहे हैं। लेकिन यह गुटबाजी पार्टी को भारी पड़ सकती है।
पिछले चुनाव में अमित शाह ने प्रदेश नेताओं की उपेक्षा कर किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया था। माना जाता है कि इससे नाराज स्थानीय नेताओं ने पार्टी का साथ नहीं दिया और मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार किरण बेदी को भी हार का सामना करना पड़ा। 25-30 न्यूनतम सीटें जीतने वाली पार्टी दिल्ली विधानसभा में महज तीन सीटों पर सिमट कर रह गई थी। देखने वाली बात होगी कि उस इतिहास से सबक लेकर पार्टी नेतृत्व गुटबाजी की इस पहेली से कैसे निबटता है।