राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के खून में राजनीति रची बसी है। वसुंधरा के बारे में आम है कि वह विरोधियों को संभलने का मौका भी नहीं देती। अब जबकि राज्य में छह महीने बाद विधान सभा चुनाव प्रस्तावित हैं, वह हर दांव आजमा रही हैं।
किरोड़ी लाल मीणा की भाजपा में वापसी के बाद वसुंधरा की निगाह सरकार विरोधी लहर को कम करने की है। इसके लिए वह राजस्थान में जातिगत समीकरण से लेकर जनता के बीच में सही संदेश पहुंचाने के हर प्रयोग को अमल में ला रही हैं। समझा जा रहा है कि इसी को ध्यान में रखकर वह जल्द ही राज्य में मंत्रिमंडलीय फेरबदल भी कर सकती हैं।
भाजपा अध्यक्ष अशोक परनामी को लेकर उठ रहे विरोध के सुर पर भी वसुंधरा की निगाह है। अशोक परनामी की जिम्मेदारी बदलने के बाद भाजपा को नया प्रदेश अध्यक्ष मिल सकता है। इसको लेकर भी राज्य भाजपा के नेताओं की निगाह दिल्ली से लेकर जयपुर के नेताओं के चेहरे पर घूम रही है। माना यह जा रहा है कि परनामी के पद छोड़ने के बाद पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष वसुंधरा के प्रिय पात्रों में से किसी एक को बनाए जाने की संभावना काफी है।
वहीं राजेन्द्र सिंह राठौड़ की जिम्मेदारी भी बढ़ सकती है। माना यह जा रहा है कि मुख्यमंत्री राज्य में हुए उपचुनाव को ध्यान में लेकर अपने प्रिय मंत्रियों के खिलाफ कोई कड़ा निर्णय भी ले सकती हैं। यह सारी कवायद सरकार विरोधी लहर को कम करने, जनता के बीच में अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए हो रही है। राज्य सरकार की योजनाओं के माध्यम से भी सरकार लगातार यह बताने की कोशिश कर रही है कि उसकी नजर में सबसे पहले समाज के सबसे पिछड़े तबके का गरीब आदमी है।
बदल जाती है सत्ता
Vasundhara Raje
राजस्थान का मिजाज स्विंग स्टेट वाले राज्य का है। इधर कई बार यह ट्रेंड देखने को मिल रहा है, जब एक बार भाजपा तो एक बार कांग्रेस सत्ता में रही है। इसलिए जयपुर में आम राजस्थानी से पूछिए तो वह भी मान लेता है कि सरकार बदलने की पूरी गुंजाइश है। सुष्मिता चतुर्वेदी जयपुर से ही हैं। पढ़ाती हैं। सुष्मिता साफ कहती हैं कि हमने वसुंधरा राजे सिंधिया के काम को देख लिया। अब दूसरे का भी काम देखेंगे।
यशवर्धन राठौड़ को भी लग रहा है कि राजस्थान में बदलाव होगा। वह कहते भी हैं कि वसुंधरा जी मुख्यमंत्री थीं, फिर अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बने। इसके बाद फिर वसुंधरा मुख्यमंत्री बनीं, अब फिर बदलाव की बारी है। भाजपा के कई नेता भी मानते हैं कि राजस्थान में सत्ता में बने रहने के लिए काफी कुछ करने की जरूरत है।
किसका राजस्थान?
वसुंधरा राजे के विकल्प के रूप में भाजपा के नेता कोई चेहरा नहीं बता पाते। दिलचस्प यह भी है कि भाजपा के नेता वसुंधरा का विरोध तो करते हैं, लेकिन खुलकर बयान देने से डरते हैं। अभी भी राजस्थान में विरोधी खेमे के नेता के तौर पर घनश्याम तिवाड़ी की ही चर्चा काफी तेज है, लेकिन राजस्थान के लोग और भाजपा के नेता तिवाड़ी को भी वसुंधरा का विकल्प नहीं मानते।
विकल्प के सवाल पर भाजपा के नेताओं का कहना है कि पार्टी में नेताओं की कमी नहीं है। वहीं विपक्ष के नेताओं में वसुंधरा के समानांतर अशोक गहलोत सबसे दमदार छवि वाले नेता बने हुए हैं। रमेश मीणा का कहना है कि अशोक गहलोत हर वर्ग के नेता हैं। हालांकि रमेश और खासकर राजस्थान के मीणा वर्ग के दिमाग में यह बात लगातार बैठती जा रही है कि कांग्रेस पार्टी अशोक गहलोत के बजाय सचिन पायलट को राज्य के अगले मुख्यमंत्री पर पेश कर सकती है।
मीणा समाज को छोड़कर अन्य सभी वर्गों में अशोक गहलोत की लोकप्रियता ठीकठाक है। हालांकि 10 में से सात-आठ लोगों का मानना है कि कांग्रेस सचिन पायलट को मुख्य नेता के तौर पर पेश करेगी।
क्या चाहते हैं भाजपा के नेता?
भाजपा के लिए प्रचार करने वाले करणी सेना के माध्यम से फिल्म पद्मावत का विरोध करने वाले लोकेंद्र सिंह कालवी का कहना है कि आगामी विधानसभा चुनाव से पहले चेहरा घोषित करके चुनाव कराया जाना ठीक नहीं होगा। इससे भाजपा को नुकसान हो सकता है। भाजपा के राजस्थान से आने वाले एक केंद्रीय नेता का भी कहना है कि राजस्थान में कोई नए मुख्यमंत्री को घोषित करके मुख्यमंत्री का चुनाव कराना महंगा पड़ सकता है।
इसलिए माना यह जा रहा है कि वसुंधरा राजे समेत प्रदेश और केंद्रीय भाजपा ईकाई एकजुट होकर राज्य में विधानसभा चुनाव की तैयारियों को आगे बढ़ाने के पक्ष में है। चुनाव बाद पार्टी विधायक दल की बैठक में नए नेता के नाम पर प्रस्ताव जैसी रणनीति को अपना सकती है। इसका एक प्रमुख कारण वसुंधरा का अपने विरोधियों को समय-समय पर चित करते रहना है। वसुंधरा ने भाजपा में अपने विरोधी माने जाने वाले घनश्याम तिवाड़ी को भी कभी सामने खड़ा नहीं होने दिया। कुछ अन्य भाजपा के केंद्रीय नेताओं को जयपुर में मजबूत नहीं होने दिया और मुख्यमंत्री ने अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए हमेशा तत्परता के साथ कदम उठाया है।