सीटों के बंटावारे की इस जद्दोजहद में केन्द्रीय मंत्री राम विलास पासवान अहम भूमिका निभा रहे हैं। वह पटना में नीतीश कुमार से मिले थे और शनिवार सात जुलाई को दिल्ली आने के बाद नीतीश कुमार ने भी उनसे जाकर भेंट की थी।
भाजपा के वरिष्ठ सूत्रों कहते हैं कि 2014 में जेडीयू के अलग होने के बाद भाजपा 29 में से 22 सीटों पर जीती थी। अगर पार्टी 22 से कम सीटों पर लड़ती है, तो पार्टी में एक नैतिक संकट खड़ा हो सकता है। जिसके चलते पार्टी 22 से कम सीटों पर लड़ने के हक में नहीं है। पार्टी के कई नेताओं का मानना है कि भाजपा 25 से कम सीटों पर समझौता नहीं करे।
हालाँकि एनडीए जेडीयू के दुबारा शामिल होने के बाद भाजपा ने लोजपा और रालोसपा की सीटों में भी कटौती का संकेत दे दिया था। इसके बाद दोनों सहयोगी दलों ने भी दबाव की रणनीति अपनाना शुरू कर दिया था।
जेडीयू की तरफ से 15 सीटों की मांग भाजपा नेताओं के लिए चौंकाने वाली है क्योंकि 2009 के लोकसभा चुनावों में बिहार की 40 सीटों के लिए 25-15 का फॉर्मूला दिया था। जबकि 2015 में हुए विधानसभा चुनावों में जेडीयू-आरजेडी-कांग्रेस गठबंधन ने चुनाव लड़ा और जद(यू) ने 71 सीटों पर जीत दर्ज की थी। भाजपा 53 सीट, लोजपा और रालोसपा 2-2 सीटों पर सिमट गई थी। जद(यू) इसकी दलील देकर सीटों का बँटवारा चाहता है।
जेडीयू नेताओं को इस बात का अच्छे से अंदाजा है कि 2009 और 2015 के फॉर्म्युले पर सहमति बनना मुश्किल है। वहीं, 2014 में मोदी लहर के दौरान भाजपा ने राज्य में 40 लोकसभा सीटों में से 22 पर जीत हासिल की थी और उसके गठबंधन सहयोगियों रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी ने 7 में से 6 और उपेन्द्र कुशवाह की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी ने 4 में से 3 सीटों पर जीत दर्ज की थी, तब अकेले दम पर लड़कर जेडीयू केवल दो सीटें ही जीत सकी थी। भाजपा भी जद(यू) की राजनीतिक अहमियत समझ रही है।
जेडीयू के केसी त्यागी भी कहते हैं कि अगर बिहार में 2019 के चुनाव के लिये सीटों का समझौता आसानी हो जाता है, तो 2020 में विधानसभा चुनाव के लिये कोई दिक्कत नहीं आयेगी। सूत्रों के मुताबिक जेडीयू की ओर से साफ संकेत दिया जा चुका है कि वह कम सीटों पर समझौता करने के लिये तैयार नहीं है, वहीं भाजपा भी पार्टी और एनडीए के हित में तर्कसंगत समाधान के पक्ष में है।