भाजपा के लिए चिंता की बात यह है कि चुनाव के नतीजे ने पीएम नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की अजेय होने की छवि पर बट्टा लगा दिया। बिहार और दिल्ली विधानसभा चुनाव को अपवाद माने तो बीते आमचुनाव से ले कर राज्यों में जीत दर जीत ने इस सियासी जोड़ी ने कांग्रेसमुक्त भारत के नारे को न सिर्फ मजबूती दी थी,ख् बल्कि इस जोड़ी के अजेय होने की छवि गढ़ दी थी। मगर इन नतीजों ने इस छवि में दरार डाल दी।
राहुल का सियासी कद बढ़ने की चिंता
आम चुनाव के साथ ही भाजपा ने बेहद सफलतापूर्वक कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के गंभीर राजनीतिज्ञ न होने और कम ज्ञान होने की छवि गढ़ी थी। हिंदी हार्टलैंड में सफाए के बाद राहुल का सियासी कद अचानक बढ़ना पार्टी के लिए नई चुनौती है। नतीजे ने भाजपा के विरुद्ध विपक्ष की गोलबंदी के मजबूत होने का भी संदेश दिया है।
नतीजे आने से ठीक पहले सहयोगी रालोसपा ने राजग से नाता तोड़ा तो नतीजे आने के बाद सहयोगी शिवसेना ने भाजपा को हराने के लिए मतदाताओं का धन्यवाद कर भविष्य में हमला तेज करने के संकेत दे दिए। निकट भविष्य में अपना दल, लोजपा और जदयू जैसे सहयोगी दलों का भी पार्टी पर दबाव बढ़ेगा। केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल ने कल ओबीसी मुद्दे पर पीएम के समक्ष नाराजगी जता कर इस आशय का साफ संदेश दे दिया था।
स्वशासित राज्य चिंता के विषय
आमचुनाव के बाद हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा स्वशासित राज्यों में मुश्किलों से घिरी, जबकि जहां कांग्रेस थी वहां आराम से सत्ता हासिल किया। आमचुनाव के बाद स्वशासित गोवा में पार्टी के सीटों की संख्या 23 से घट कर 12 रह गई, वहीं गुजरात में पार्टी तिहाई अंकों में नहीं पहुंच पाई।
इसके बाद अब मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ और राजस्थान जैसे स्वशासित राज्यों में पार्टी का चुनाव से सामना हुआ और पार्टी ने तीनों राज्य गंवा दिए। पार्टी नेतृत्व के लिए संकेत साफ हैं, प्रतीकात्मक और धारणा बनाने की राजनीति के इतर मतदाताओं की निगाहें अब भाजपा की सरकारों के कामकाज पर भी है।