बिहार में जब मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) चल रहा था और विपक्ष जमकर इसे मुद्दा बना रहा था, तब भाजपा का संगठन अंदरखाने चुपचाप जमीन पर तैयारी कर रहा था। भाजपा ने इस तरह की रणनीति बनाई कि वह हर बूथ और यहां तक कि हर वोटर तक पहुंची। शुक्रवार को सामने आए चुनाव नतीजों में भाजपा ने अपने स्ट्राइक रेट से यह साबित कर दिया कि महागठबंधन के लिए इस रणनीति का तोड़ ढूंढ पाना मुश्किल है। भाजपा सूत्रों ने अमर उजाला को जो बताया और बिहार में हमारे चुनावी रथ 'सत्ता के संग्राम' के दौरान जो दिखा, उस आधार पर पढ़िए इस रणनीति के पीछे की पूरी कहानी...
1. हर एक विधानसभा सीट, हर एक वोटर तक पहुंची पार्टी
भाजपा ने बिहार के लिए सूक्ष्म स्तर पर रणनीति बनाई थी। इस रणनीति का आखिरी दौर तब शुरू हुआ, जब चुनाव आयोग ने SIR की प्रक्रिया शुरू की। इस प्रक्रिया के दौरान भाजपा पूरी तरह सक्रिय हो गई। नेताओं-कार्यकर्ताओं को मतदाताओं का मन टटोलने की जिम्मेदारी दी गई। भाजपा कार्यकर्ता और नेता हर एक विधानसभा सीट के हर बूथ स्तर पर हर एक वोटर तक प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पहुंचे। इसी आधार पर एक फीडबैक रिपोर्ट तैयार की गई। इसके बाद अंतिम रणनीति तय हुई। भाजपा को जहां यह महसूस हुआ कि यहां नुकसान हो सकता है, वहां उसने भरपाई की तैयारी कर ली।
पूरे बिहार को भाजपा ने पांच जोन में बांट दिया। फिर नेताओं को जनसंपर्क की जिम्मेदारी दी गई। यह जनसंपर्क ठीक तरह हो रहा है या नहीं, इसकी लगातार समीक्षा की जिम्मेदारी उन नेताओं को दी गई, जो पहले अन्य राज्यों में चुनावी जिम्मेदारी संभाल चुके हैं।
उदाहरण के लिए, अलीनगर सीट से मैथिली ठाकुर पहली बार चुनाव लड़ रही थीं। उन्हें चुनाव लड़ाने के लिए दूसरे प्रदेशों के प्रभारी और कैबिनेट मंत्री रह चुके नेताओं की ड्यूटी लगाई गई। मैथिली रोज किन इलाकों में जाएंगी, उनके जनसंपर्क की रूपरेखा क्या होगी, उम्मीदवार के साथ कौन होगा, बाकी क्षेत्रों में प्रचार के लिए कौन जाएगा, यह सब कुछ बाकी नेता देख रहे थे।
2. दो प्रभारी, एक उपमुख्यमंत्री, कई कैबिनेट मंत्री, सब विपक्ष पर भारी
बिहार चुनाव के लिए भाजपा की तरफ से राज्य प्रभारी विनोद तावड़े और चुनाव प्रभारी धर्मेंद्र प्रधान की जोड़ी काम कर रही थी। इस जोड़ी ने सीट शेयरिंग से लेकर उम्मीदवारों के चयन और महागठबंधन की ओर से एनडीए के खिलाफ चल रहे प्रचार से निपटने का जिम्मा संभाला। संगठन के स्तर पर भाजपा किस तरह चुनाव लड़ेगी, इसकी रूपरेखा तय करने में इन दोनों प्रभारियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
दूसरे राज्यों के बड़े नेताओं की पूरी फौज को बिहार में जमीन पर उतारा गया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भले ही इसके सूत्रधार रहे, लेकिन रणनीति को अमल में लाने की कमान इन्हीं बड़े नेताओं के पास थी। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को बिहार की 78 सीटों की जिम्मेदारी दी गई थी। वे लगभग एक महीना बिहार में ही रहे। इसी तरह मध्य प्रदेश भाजपा के प्रभारी डॉ. महेंद्र सिंह सितंबर से बिहार में थे। उनके पास दो जोन के तहत 12 लोकसभा क्षेत्रों के अंतर्गत आने वाली 58 विधानसभा सीटों की जिम्मेदारी थी। कई राज्यों के जिलाध्यक्षों, संगठन मंत्रियों को बूथ स्तर की जिम्मेदारी दी गई थी।
3. छठ को जनसंपर्क के मौके के तौर पर लिया, प्रवासियों तक पहुंचे
भाजपा ने लोक आस्था के सबसे बड़े पर्व छठ के अवसर का भी इस्तेमाल किया। छठ के दौरान मतदाताओं से अनौपचारिक मुलाकातें की गईं। पार्टी नेताओं को आम लोगों के साथ सांस्कृतिक जुड़ाव स्थापित करने की जिम्मेदारी दी गई। छठ पर बडे़ पैमाने पर दूसरे राज्यों में रह रहे लोग बिहार लौटते हैं। इनमें से जो सूचीबद्ध मतदाता हैं, वो मतदान करने कैसे लौटेंगे, इस पर भी फोकस किया गया।
4. जिस वर्ग का नेता, उस वर्ग की जिम्मेदारी
बूथ स्तर और मतदाताओं तक पहुंचने और छठ जैसे मौकों पर सक्रिय रहने के अलावा भाजपा ने अलग-अलग वर्गों को साधने की भी रणनीति बनाई। SIR और उसके बाद प्रचार के दौरान भाजपा ने दो तरह से फोकस किया। पहला- पिछली बार जिन सीटों पर भाजपा हारी थी या इस बार जहां उसे जीत की उम्मीद कम थी, उन सीटों पर अलग-अलग वर्गों के प्रतिनिधियों से घर-घर जाकर संपर्क किया गया।
दूसरा- जो वर्ग नाराज या दूर नजर आया, उस वर्ग के सबसे बड़े नेता को मनाने की कोशिश की गई। भाजपा के अंदर उस वर्ग का बड़ा चेहरा कौन है, यह देखकर नाराज गुटों से संवाद साधने की कोशिश की गई। ऐसे असंतुष्ट नेताओं या समाज के प्रतिनिधियों की शीर्ष नेताओं से मुलाकात करवाई गई। जहां संभव था, वहां उन्हें रैलियों के मंच पर और बैठकों में जगह दी गई, ताकि कोई नाराजगी न रहे। जो जिस समुदाय का नेता था, उसे उस समुदाय से संपर्क साधने को कहा गया। जो मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, सांसद या मंत्री जिस वर्ग विशेष से आता है, उसे उसी वर्ग के बीच जनसंपर्क की जिम्मेदारी दी गई।
5. सहयोगी दलों को ज्यादा महत्व, तल्खी को समन्वय में बदला
माना जाता है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में जब भाजपा की सीटें कम हो गईं, तो उसने राज्यों में सहयोगी दलों को ज्यादा महत्व देना शुरू कर दिया। सहयोगी दलों में उसके लिए तीन दल सबसे महत्वपूर्ण हैं। नीतीश कुमार का जनता दल यूनाइटेड, चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी और एकनाथ शिंदे की शिवसेना। जब बिहार चुनाव नजदीक थे, तो यह माना जा रहा था कि एनडीए में सबसे ज्यादा इसी बात पर टकराव होगा कि कौन-सा दल कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेगा। हालांकि, भाजपा इसे आसानी से सुलझाने में कामयाबी रही। यह फॉर्मूला निकाला गया कि भाजपा और जदयू बराबर की सीटों लड़ेंगे। चिराग पासवान की लोजपा को भी पर्याप्त सीटें दी गईं। तीनों ही दलों का स्ट्राइक रेट बेहतर रहा। छह सीटों पर लड़कर जीतनराम मांझी की 'हम' भी पांच सीटों पर आगे रही।
जदयू और लोजपा के बीच लंबे समय तक रही तल्खी को भी भाजपा ने खत्म किया। चुनाव के दौरान जमीन पर लोजपा और जदयू के बीच टकराव न हो, यह सुनिश्चित कराने में भाजपा कामयाब रही। कुछ क्षेत्रों में ऐसा भी हुआ, जहां भाजपा नेता टिकट पाने के दावेदार थे, लेकिन सहयोगी दल के खाते में वह सीट आने पर उसी दावेदार नेता ने सहयोगी दल के उम्मीदवार के चुनाव प्रबंधन का काम संभाला।