पिछले लोकसभा चुनाव में अपना दल के साथ उत्तर प्रदेश की 73 सीटें अपने नाम करने वाली भाजपा आगामी आम चुनाव के मुकाबले को किसी भी सूरत में चतुष्कोणीय बनाने में जुटी है। इस क्रम में पहले से बड़ी चुनौती बने सपा-बसपा गठबंधन से कांग्रेस के दूर रहने से पार्टी ने राहत की सांस ली है। पार्टी के रणनीतिकारों को लगता है कि शिवपाल यादव की प्रगतिशील समाजवादी पार्टी समेत कुछ अन्य क्षत्रपों द्वारा नई पार्टी बनाकर मैदान में उतरने से मुकाबला चतुष्कोणीय होगा। इससे अगले चुनाव में पार्टी की राह आसान होगी।
हाल ही में राज्य में बड़ी जिम्मेदारी संभालने वाले एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक, अगर कांग्रेस भी सपा-बसपा के साथ आती है तो निश्चित रूप से हमारी चुनौती बढ़ जाएगी। बीते चुनाव के हिसाब से सपा-बसपा और भाजपा का मत प्रतिशत करीब करीब 42-42 फीसदी है। ऐसे में अगर कांग्रेस का 7 फीसदी वोट भी इस गठबंधन के साथ आ जाता है तो पार्टी की चुनौती और बड़ी हो जाती। सूबे की 20 सीटों पर दलितों, यादवों और मुसलमानों की संयुक्त आबादी 50 फीसदी से ज्यादा है। इन बिरादरी को सपा-बसपा का कोर वोट बैंक माना जाता है।
कांग्रेस द्वारा किसानों के मुद्दे पर आक्रामक राजनीति का हिस्सा बनाने से भी भाजपा को राज्य के कई क्षेत्रों में मुकाबला त्रिकोणीय होने की उम्मीद बंधी है। दरअसल यूपीए-2 के कार्यकाल में मनमोहन सरकार द्वारा किसानों की ऋण माफी के बाद हुए चुनाव में बिना किसी मजबूत संगठन के कांग्रेस आश्चर्यजनक रूप से 21 सीटें जीतने में कामयाब रही थी। पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि जिस प्रकार कांग्रेस ने कई राज्यों में सत्ता हासिल करने के बाद किसानों का ऋण माफ किया है, उससे वह सपा-बसपा के लिए मुसीबत खड़ी कर सकती है।
फिलहाल एनडीए का किला बचाने पर सारा ध्यान
सपा-बसपा से मुकाबले के लिए मिशन 50 फीसदी अभियान चलाने वाली भाजपा का सारा ध्यान राज्य में एनडीए का किला बचाने पर है। पार्टी इस संदर्भ में सुहेल देव भारतीय समाज पार्टी के रुख को लेकर संतुष्ट नहीं है और विकल्पों पर ध्यान देना शुरू कर दिया है। जबकि पार्टी की रणनीति अपना दल को हर हाल में साथ बनाए रखने की है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि इसी महीने होने वाली पार्टी की राष्ट्रीय परिषद के बाद अपना दल से मतभेद दूर कर लिए जाएंगे।