भीमराव आंबेडकर
- फोटो : File Photo
आज भीमराव आंबेडकर की 128वीं जयंती है। उनकी जयंती के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी समेत कई लोगों ने उन्हें याद किया है। प्रधानमंत्री मोदी ने आंबेडकर को नमन करते हुए ट्विटर पर एक वीडियो भी शेयर किया है। ना केवल भारत बल्कि दुनियाभर में भारतीय संविधान के रचयिता, समाज सुधारक और महान नेता डॉक्टर भीमराव आंबेडकर की जयंती धूमधाम से मनाई जाती है।
भीमराव आंबेडकर बाबा साहेब के नाम से जाने जाते थे। वह जीवनभर समानता के लिए संर्घष करते रहे। यही वजह है कि उनकी जयंती को समानता और ज्ञान दिवस के रूप में मनाया जाता है। चलिए आपको बताते हैं उनसे जुड़ी 10 बातें-
भीमराव आंबेडकर
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डॉक्टर भीमराव आंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल, 1891 को मध्यप्रदेश के महू में हुआ था। हालांकि वह मराठी परिवार से थे। वह मूल रूप से महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के आंबडवे गांव से थे। उनके पिता का नाम रामजी मालोजी और माता का नाम भीमाबाई था। महार जाति से ताल्लुक रखने वाले आंबेडकर को अपने जीवन में छुआछूत का सामना करना पड़ा। वह महार जाति के थे, जिसे समाज में अछूत माना जाता था।
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आंबेडकर बचपन से ही तीव्र बुद्धि के थे। लेकिन समाज में छुआछूत के कारण उन्हें प्रारंभिक शिक्षा लेने में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। बाबा साहेब का उपनाम उनके गांव के नाम के आधार पर रखा गया था। उनके स्कूल के एक शिक्षक को उनसे काफी लगाव था। उस शिक्षक ने ही आंबडवे को सरल बनाते हुए उसे आंबेडकर किया।
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बाबे साहेब मुंबई की एल्फिंस्टन रोड पर स्थित गवर्नमेंट स्कूल के पहले ऐसे छात्र थे, जिनके साथ छुआछूत का व्यवहार किया जाता था। साल 1913 में उनका अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए चयन हुआ। यहां उन्होंने राजनीति विज्ञान में ग्रेजुएशन किया। फिर साल 1916 में उन्हें एक शोध के लिए पीएचडी से सम्मानित किया गया।
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बाबा साहेब लंदन में अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट करना चाहते थे लेकिन उन्हें बीच में अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी। क्योंकि उनकी स्कॉलरशिप खत्म हो गई थी। इसके बाद उन्होंने ट्यूटर समेत कई कामों को किया लेकिन सामाजिक भेदभाव के कारण सफल नहीं हो पाए। उन्होंने मुंबई के सिडनेम कॉलेज में प्रोफैसर के तौर पर भी काम किया। फिर 1923 में उन्होंने 'द प्रॉब्लम ऑफ द रुपी' नाम से एक शोध किया, जिसके लिए उन्हें लंदन यूनिवर्सिटी ने डॉक्टर्स ऑफ साइंस की उपाधि दी। इसके बाद साल 1927 में उन्हें कोलंबंनिया यूनिवर्सिटी ने पीएचडी की डिग्री दी।
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उन्होंने समाज में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को समानता दिलाने के लिए संर्घष किया। उन्होंने इन समुदायों के लिए पृथक निर्वाचिका और आरक्षण देने की वकालत की थी।
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हालांकि साल 1932 में ब्रिटिश सरकार ने उनकी पृथक निर्वाचिका के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी, लेकिन इसके विरोध में महात्मा गांधी ने आमरण अनशन शुरू कर दिया। जिसके बाद उन्हें अपनी ये मांग वापस लेनी पड़ी। लेकिन बाद में इस समुदाय को सीटों में आरक्षण, मंदिरों में प्रवेश देने और इनके साथ छुआछूत ना करने की बात मान ली गई।
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बताया जाता है कि आंबेडकर ये कहते थे कि छुआछूत गुलामी से भी बदतर है। वह बड़ौदा के रियासत राज्य द्वारा शिक्षित थे, इसी कारण उनकी सेवा करने के लिए बाध्य थे। उन्हें महाराजा गायकवाड़ का सैन्य सचिव नियुक्त किया गया, लेकिन जातिगत भेदभाव के कारण कुछ ही समय में यह नौकरी छोड़ दी।
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उन्होंने कई ऐसी किताबें भी लिखीं, जो विवादों में रहीं। आंबेडकर की इन किताबों में 'थॉट्स ऑन पाकिस्तान' और 'वॉट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबल्स' शामिल हैं।
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वह देश के पहले कानून मंत्री थे। 29 अगस्त 1947 को आंबेडकर को भारत की संविधान मसौदा समिति का अध्यक्ष भी नियुक्त किया गया। देश का संविधान बनाने में उनका अहम योगदान है।
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14 अक्तूबर, 1956 को नागपुर में एक औपचारिक सार्वजनिक समारोह में उन्होंने बौद्ध धर्म को अपना लिया। 'द बुद्ध एंड हिज धम्म' उनकी लिखी आखिरी किताब है। जो उनकी मृत्यु के बाद 1957 में प्रकाशित हुई।