2002 के बिलकिस बानो सामूहिक बलात्कार मामले में 11 दोषियों की रिहाई को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर, मामले में रिहा किए गए एक दोषी ने सवाल उठाए हैं। उन्होंने अपने जवाबी हलफनामे में याचिकाकर्ताओं के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाया है। मामले में रिहा किए गए राधेश्याम ने कहा कि याचिकाकर्ताओं में से कोई भी मामले से संबंधित नहीं है। याचिकाकर्ता या तो राजनीतिक कार्यकर्ता हैं या किसी तीसरे पक्ष के लोग हैं। इन याचिकाकर्ताओं में से किसी भी प्रत्यक्ष रूप से मामले से कोई संबंध नहीं है। गौरतलब है कि राधेश्याम और 10 अन्य दोषियों को हाल ही में गुजरात सरकार द्वारा छूट पर रिहा किया गया था।
रिहा किए गए दोषी ने याचिकाकर्ताओं के अधिकार पर उठाए सवाल
याचिका पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि अगर ऐसी याचिकाओं पर अदालत विचार करती है, तो यह किसी भी आदमी के किसी भी आपराधिक मामले में किसी भी अदालत में याचिका दाखिल करने के लिए एक खुला निमंत्रण होगा।
रिहाई के खिलाफ दाखिल हुई हैं कई याचिकाएं
रिहा किए गए दोषी श्याम ने अपने हलफनामे में कहा कि उन लोगों की रिहाई पर याचिका दायर करने वाले याचिकाकर्ताओं में माकपा नेता सुभाषिनी अली हैं, जो कि एक पूर्व सांसद और अखिल भारतीय लोकतांत्रिक महिला संघ की उपाध्यक्ष होने का दावा करती हैं। उनके अलावा एक दूसरी याचिकाकर्ता पत्रकार रेवती लॉल और तीसरी सामाजिक कार्यकर्ता रूप रेखा वर्मा हैं।
श्याम ने कहा कि शीर्ष अदालत ने पहले के मामलों में स्पष्ट रूप से कहा है कि एक आपराधिक मामले में किसी भी अजनबी को किसी निर्णय की शुद्धता पर सवाल उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। यदि इसकी अनुमति दी जाती है, तो कोई भी व्यक्ति दर्ज की गई आपराधिक अभियोजन/कार्यवाही को चुनौती दे सकता है। हलफनामे में कहा गया है कि वर्तमान रिट याचिका में याचिकाकर्ता गुजरात राज्य के माफी आदेश को चुनौती देना चाहते हैं, जिसमें उत्तर देने वाले प्रतिवादी सहित 11 आरोपी व्यक्तियों को रिहा किया गया था। पैरा 1बी में रिट याचिकाकर्ता ने यह दलील भी दी है कि इस मामले में उसका कोई व्यक्तिगत हित नहीं है और उसे दाखिल करने से कुछ हासिल नहीं होता है। हालांकि याचिकाकर्ता ने यह आगे बताया है कि रिट याचिका जनहित में दायर की गई है। याचिकाकर्ता के अनुसार, ऐसे व्यक्तियों की रिहाई ने समाज की चेतना को झकझोर दिया है जिसने याचिकाकर्ता को यह जनहित याचिका दायर करने के लिए प्रेरित किया है।
हलफनामे में उन्होंने यह भी कहा है कि हैरान कर देने वाली बात यह है कि मामले में न तो राज्य और न ही पीड़ित और न ही शिकायतकर्ता ने इस न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। इस प्रकार, यह सम्मानपूर्वक प्रस्तुत किया जाता है कि यदि इस तरह के मामलों पर इस अदालत द्वारा विचार किया जाता है, तो कानून के लिए एक अस्थिर स्थिति बन जाएगी।
शीर्ष अदालत ने मांगा था जवाब
न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी और न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना की पीठ के समक्ष यह मामला सुनवाई के लिए आया। शीर्ष अदालत ने 25 अगस्त को इस मामले में 11 दोषियों को दी गई छूट को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र और गुजरात सरकार से जवाब मांगा था।
गुजरात सरकार ने किया था रिहा
इस मामले में दोषी ठहराए गए 11 लोगों को 15 अगस्त को गोधरा उप-जेल से रिहा कर दिया गया था। गुजरात सरकार ने अपनी छूट नीति के तहत उनकी रिहाई की अनुमति दी थी। इन्होंने जेल में 15 साल से अधिक समय पूरा किया था। पिछले महीने मामले की सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने पाया था कि सवाल यह है कि क्या छूट पर विचार करते समय दिमाग का प्रयोग किया गया था और क्या यह कानून के मानकों के भीतर था।