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बिल्किस बानो केस: दोषियों की रिहाई को चुनौती वाली याचिकाओं का निस्तारण दो मई को; सुप्रीम कोर्ट ने तय की तारीख

Tue, 18 Apr 2023 04:41 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

13 मई 2022 को दिए फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को दोषियों की समय पूर्व रिहाई पर विचार करने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने गुजरात सरकार को 9 जुलाई 1992 की उसकी नीति पर विचार करने को कहा था। इसके बाद ही 15 अगस्त 2022 को गुजरात सरकार ने दोषियों को समय पूर्व रिहा करने का आदेश दिया था।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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बिल्किस बानो मामले में दोषियों को छूट पर मूल फाइलें मांगने के 27 मार्च के आदेश की समीक्षा के लिए याचिका दायर की जा सकती है। केंद्र और गुजरात सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह जानकारी दी। सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने बिलकिस मामले में क़ैद के दौरान दोषियों को पैरोल दिए जाने पर सवाल उठाया। साथ ही कहा कि अपराध की गंभीरता को देखते हुए राज्य द्वारा विचार किया जाना चाहिए था। सुप्रीम कोर्ट ने बिल्किस बानो मामले में दोषियों को सजा में छूट को चुनौती देने वाली याचिकाओं को दो मई को अंतिम निस्तारण के लिए सूचीबद्ध किया है।

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इस दौरान दोषियों को समय से पहले रिहा करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस केएम जोसफ ने गुजरात सरकार को फटकार लगाई। साथ ही कहा कि आज यह महिला (बिलकिस) है, कल आप या मैं हो सकते हैं। जस्टिस जोसेफ ने कहा, यह सिर्फ एक हत्या का मामला नहीं है, बल्कि सामूहिक हत्या का मामला है। ऐसे अपराध सामान्य रूप से समाज और समुदाय के खिलाफ होते हैं। इसलिए जब आप क्षमादान देते हैं तो आप पीड़ित के दर्द की तुलना हत्या के सामान्य मामले से नहीं कर सकते। अलग-अलग चीजों को एक समान नहीं माना जा सकता। शीर्ष अदालत ने कहा, सेव की तुलना नारंगी से नहीं की जा सकती और इस तरह का कोई भी निर्णय सिर्फ जनता की भलाई के लिए होना चाहिए।

जस्टिस जोसेफ और जस्टिस बीवी नागरत्ना की पीठ ने कहा, जब समाज को बड़े पैमाने पर प्रभावित करने वाले ऐसे जघन्य अपराधों में छूट पर विचार किया जाता है तो सार्वजनिक हित को ध्यान में रखते हुए शक्ति का प्रयोग किया जाना चाहिए। हम केवल यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि शक्ति का वास्तविक प्रयोग हो। सत्ता का कोई गैरकानूनी प्रयोग न हो। पीठ ने कहा, जिस तरह से अपराध किया गया, वह भयानक था। पीठ ने यह भी नोट किया कि हर दोषी को 1000 दिन से अधिक का पैरोल मिला था।
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कोर्ट ने कहा, सिर्फ इसलिए कि केंद्र सरकार ने राज्य के फैसले से सहमति जताई है, इसका मतलब यह नहीं है कि राज्य को अपना दिमाग लगाने की जरूरत नहीं है। सवाल यह है कि क्या सरकार ने अपना 'दिमाग' लगाया था। राज्य ने किस सामग्री को अपने निर्णय का आधार बनाया? न्यायिक आदेश के तहत दोषियों को उनके जीवनभर जेल में रहने की आवश्यकता है। कार्यकारी आदेश के आधार पर दोषियों को समय पूर्व रिहा किया गया। दोषियों को रिहा करने का एक सार्थक मानक होना चाहिए। यदि आप हमें कारण नहीं देते (दोषियों को रिहा करने का) हैं, तो हम अपना निष्कर्ष निकालेंगे।

 
गुजरात सरकार को अवमानना कार्यवाही की चेतावनी
सुनवाई के दौरान पीठ ने आदेश के बावजूद दोषियों की समय पूर्व रिहाई से संबंधित फाइल पेश नहीं करने पर गुजरात सरकार के खिलाफ नाराजगी जताई। पीठ ने सवाल किया कि आखिर रिकॉर्ड पेश क्यों नहीं किया गया। आप फाइल प्रस्तुत नहीं कर अवमानना कर रहे हैं। हम स्वत: संज्ञान लेकर अवमानना की कार्यवाही शुरू कर सकते हैं।
 
27 मार्च को मांगी थी सरकार से रिहाई के कारणों की फाइल
पीठ दोषियों की समय से पहले रिहाई को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें खुद पीड़िता द्वारा दायर याचिका भी शामिल है। पीठ ने मामले को दो मई के लिए सूचीबद्ध किया है। उस दिन पीठ 27 मार्च के आदेश के खिलाफ सरकार द्वारा दायर की जाने वाली प्रस्तावित समीक्षा याचिका पर भी फैसला करेगी। पीठ ने 27 मार्च को गुजरात सरकार को निर्देश दिया था कि दोषियों को रिहा करने के लिए जो कारण दिए गए, उसकी पूरी फाइल कोर्ट में पेश करे।
 
फाइल पेश करने के आदेश को चुनौती दे सकती है सरकार
गुजरात सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) एसवी राजू ने कहा कि दोषियों की समय पूर्व रिहाई के निर्णय से सबंधित रिकॉर्ड तलब करने के 27 मार्च के आदेश को केंद्र और राज्य सरकार चुनौती देने का मन बना रही हैं। इसलिए हम फाइल पेश करने के लिए समय मांग रहे हैं। यह हमारा विशेषाधिकार है। राजू ने पीठ से कहा कि हम सोमवार तक विचार करेंगे कि पुनर्विचार याचिका दायर करनी है या नहीं?'
 
गौरतलब है कि बिल्किस बानो ने पिछले साल 30 नवंबर को शीर्ष अदालत में राज्य सरकार द्वारा 11 लोगों को आजीवन कारावास से समय से पहले रिहाई को चुनौती दी थी। साथ ही यह भी कहा था कि इसने समाज की अंतरात्मा को हिला दिया है। वहीं, 4 जनवरी को जस्टिस अजय रस्तोगी और बेला एम त्रिवेदी की पीठ ने बानो द्वारा दायर याचिका और अन्य याचिकाओं पर सुनवाई की थी। हालांकि, न्यायमूर्ति त्रिवेदी ने बिना कोई कारण बताए मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार याचिका भी लगाई
दोषियों की रिहाई के खिलाफ दायर याचिका के साथ ही बिल्किस बानो ने 13 मई 2022 को दिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी एक पुनर्विचार याचिका दायर की थी। इसमें शीर्ष अदालत के 13 मई, 2022 को एक दोषी की याचिका पर दिए गए आदेश की समीक्षा की मांग की गई थी। हालांकि समीक्षा याचिका को बाद में पिछले साल दिसंबर में खारिज कर दिया गया था।

15 अगस्त 2022 को हुई थी दोषियों की रिहाई
13 मई 2022 को दिए फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को दोषियों की समय पूर्व रिहाई पर विचार करने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने गुजरात सरकार को 9 जुलाई 1992 की उसकी नीति पर विचार करने को कहा था। इसके बाद ही 15 अगस्त 2022 को गुजरात सरकार ने दोषियों को समय पूर्व रिहा करने का आदेश दिया था। बता दें कि 2002 के दंगों के दौरान बिल्किस बानो के परिवार के सात लोगों की हत्या भी कर दी गई थी। 

देरी करने का तरीका : मोइत्रा
तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने बिलकिस बानो मामले में सामूहिक दुष्कर्म और हत्या के दोषियों की रिहाई के कारणों की फाइल सुप्रीम कोर्ट में नहीं पेश करने पर केंद्र और गुजरात सरकार पर निशाना साधा है। मोइत्रा ने इसे मामले में देरी करने का तरीका करार देते हुए कहा, यह पूरी तरह अदालत की अवमानना का मामला है।

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