बिहार की राजनीति में एक बार फिर से सीएम नीतीश कुमार के संभावित नए सियासी दांव की चर्चा है। माना जा रहा है कि शुक्रवार को जदयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी और राष्ट्रीय परिषद की बैठक में नीतीश अपने करीबी और पार्टी में नंबर दो की हैसियत रखने वाले राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह से किनारा करेंगे। वैसे नीतीश के लिए अपनों को पराया कराना कोई नई बात नहीं है। बीते दो दशक में नीतीश ने अपने राजनीतिक गुरु जॉर्ज फर्नांडिस, शरद यादव से लेकर कई ऐसी हस्तियों से किनारा किया है, जिनकी हैसियत एक समय पार्टी में नंबर दो की हुआ करती थी।
इस मामले में सबसे बड़ा उदाहरण जॉर्ज का है। नीतीश ने अपने राजनीतिक गुरु जॉर्ज के साथ मिलकर पहले समता पार्टी बनाई। फिर पार्टी का शरद यादव की पार्टी से विलय कर 2003 में जदयू को अस्तित्व में लाए। इसी जदयू ने लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद की राज्य की डेढ़ दशक की सत्ता से विदाई की पटकथा लिखी। हालांकि, कुछ साल बाद ही मतभेद इतने गहराए कि 2009 के चुनाव में जॉर्ज का मुजफ्फरपुर से टिकट काट दिया गया। निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरे जॉर्ज चुनाव हारे और उनकी राजनीति पर पूर्णविराम लग गया।
शरद यादव से भी किनारा
जॉर्ज की तुलना में नीतीश और शरद यादव का साथ थोड़ा लंबा चला। हालांकि, साल 2013 में जदयू के राजग से नाता तोड़ने से दोनों के संबंधों में खटास का प्रवेश हुआ। बाद में जब नीतीश ने साल 2017 में एक बार फिर से राजग से नाता जोड़ा तो दोनों के रिश्तों के बीच कभी न भरने वाली खाई बन गई। शरद ने अलग पार्टी बनाई और नीतीश ने उन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया।
मांझी, प्रशांत, आरसीपी, कुशवाहा भी हुए शिकार
जदयू में अपने-अपने समय में जीतन राम मांझी, आरसीपी सिंह, उपेंद्र कुशवाहा और प्रशांत किशोर की हैसियत नीतीश के बाद नंबर दो की थी। हालांकि, ये सभी अलग-अलग समय में नीतीश के कोपभाजन बने। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद जिस मांझी को नीतीश ने अपनी जगह सीएम बनाया, उन्हें नौ महीने बाद ही उनके हाल पर छोड़ दिया। उपेंद्र कुशवाहा दो बार जदयू में आए और दोनों ही बार नीतीश की उपेक्षा का शिकार हुए। 2015 के विधानसभा चुनाव में जीत के रणनीतिकार रहे प्रशांत किशोर को नीतीश ने अपना सलाहकार और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाकर नंबर दो की हैसियत दी। हालांकि, इसके चंद महीने बाद उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया। इसी प्रकार नौकरशाह से राजनेता बने आरसीपी सिंह से नाराज होकर उन्हें राज्यसभा का टिकट नहीं दिया। परिणाम यह हुआ कि आरसीपी को अपना मंत्री पद गंवाना पड़ा।