सुशील मोदी को मिला उभार
दरअसल, बिहार में भाजपा कभी एक सीमा से आगे नहीं बढ़ पाई। इसके लिए संभवतया उसकी हिंदूवादी राजनीतिक विचारधारा को जिम्मेदार कहा जा सकता है, जो बिहार के मजबूत सेक्युलर नेताओं के करिश्मे के कारण कभी सफल नहीं हो पाई। कांग्रेसकाल से बाहर आने के बाद भी बिहार की राजनीति लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार के इर्द-गिर्द घूमती रही। भाजपा को बिहार में सत्ता का स्वाद केवल नीतीश कुमार के साथ आने के बाद ही मिला। नीतीश के साथ आने के बाद लगभग दो दशक से (कुछ अंतराल को छोड़कर) भाजपा सत्ता में रही।
लेकिन भाजपा कार्यकर्ताओं का आरोप है कि नीतीश के साथ आने के कारण पार्टी सिमटकर रह गई। सुशील कुमार मोदी बिहार में भाजपा के एकमात्र बड़े नेता के रूप में उभरे। लेकिन प्रदेश में उन्हें भाजपा के बीच नीतीश कुमार के ‘एजेंट’ के तौर पर देखा जाता रहा। आरोप तो यहां तक लगाया जाता है कि उनके कहने पर विधानसभा चुनावों में टिकटों का वितरण भी इस प्रकार किया जाता था, जिससे भाजपा को ज्यादा मजबूत होने का अवसर न मिले। उनके साथ गिरिराज सिंह, राधामोहन सिंह जैसे नेता प्रदेश में बड़े कद के अवश्य रहे, लेकिन भाजपा की पहचान बनकर केवल सुशील मोदी ही उभरे।
नए विकल्प को उभारने की कोशिश
पार्टी कार्यकर्ताओं को लग रहा है कि शायद अब केंद्रीय नेतृत्व पूरी ताकत के साथ बिहार में जुटेगा और बिहार के सामाजिक-जातीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए नए विकल्प को उभारने की कोशिश करेगा। बिहार की वर्तमान परिस्थितियां नए नेतृत्व को उभारने में पूरा सहयोग दे सकती हैं। बिहार की राजनीति अब दो ध्रुवीय होती दिख रही है, जिसमें एक तरफ भाजपा होगी जो हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और इस्लामिक चरमपंथ के खिलाफ अपना जनाधार बढ़ाने का काम करेगी, तो दूसरी तरफ जातीय गठजोड़ और सेक्युलर राजनीति के नाम पर आरजेडी-जदयू राजनीति करेंगी। यदि भाजपा राष्ट्रवाद के सहारे बिहार का ‘जातीय तिलस्म’ तोड़ने में कामयाब रही तो उसकी किस्मत खुल सकती है।
लेकिन प्रदेश के नेता-कार्यकर्ता मानते हैं कि बिहार की राजनीति को साधने के लिए यहां सभी जातियों के बीच स्वीकार्य नेतृत्व उभारने होंगे। पार्टी को समझना पड़ेगा कि तारकिशोर प्रसाद या रेनू देवी जैसे रबर स्टैंप नेताओं के सहारे बिहार को नहीं जीता जा सकता।