बिहार के साथ-साथ देश की राजनीति में तूफान खड़ा करने वाला चारा घोटाला हालांकि 1996 में उजागर हुआ लेकिन इसके 11 साल पहले यानी 1985 में ही भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने राज्य के कोषागारों से फर्जी निकासी की ओर इशारा किया था, लेकिन तब किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया और जब बाद में इसका घड़ा फूटा तो पता चला कि यह खेल दो दशकों से चल रहा था और इसमें लगभग 950 करोड़ रुपये की हेराफेरी की गई, जिसमें नेताओं और अधिकारियों से लेकर व्यापारियों ने जमकर चांदी काटी। सरकारी खजाने की इस लूट को भ्रष्टाचार के माफिया राज का पहला उदाहरण माना जाता है।
इस घोटाले में पशुधन के फर्जी आंकड़े दिखाकर उनके लिए चारा, दवाइयों और पशुपालन के उपकरण की खरीद के फर्जी बिल पेश किए गए और सरकारी खजाने से अवैध निकासी की गई। भारत के तत्कालीन सीएजी टीएन चतुर्वेदी ने बिहार के कोषागारों और विभागों से हर महीने का लेखाजोखा मिलनेे में हो रही देरी की ओर तब के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर सिंह का ध्यान आकृष्ट कराया था।
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सीएजी ने मुख्यमंत्री को आगाह भी किया था कि इस देरी के पीछे सरकारी खजाने में हेराफेरी एक वजह हो सकती है। सिंह के बाद भी राज्य के कई मुख्यमंत्रियों को इस बारे में चेतावनी दी गई लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ क्योंकि इस खेल में नेता, अधिकारी और बिजनेसमैन सभी शामिल थे।
बिहार पशुपालन संगठन ने भी खोली थी पोल
बिहाल पशुपालन संगठन ने भी 1985 में ही एक संवाददाता सम्मेलन के जरिए पशुपालन माफिया की पोल खोल दी थी। इसके बाद संगठन की कार्यकारी समिति को ही बदल दिया गया और डॉ. दिनेश्वर शर्मा को उसका महासचिव बना दिया गया। शर्मा बाद में इस घोटाले में आरोपी बनाए गए। उन पर 300 करोड़ रुपये की हेराफेरी का आरोप लगा। इससे पता चलता है कि पशुपालन माफिया कितना ताकतवर था।