सियासी दलों की गुजरात के बाद यूपी में भी परीक्षा की बारी आ गई है। हालांकि लोकसभा की सिर्फ दो सीटों के लिए उपचुनाव के रूप में होने वाली यह परीक्षा काफी छोटी होगी, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर इसके संदेश बड़े और दूरगामी होंगे। उपचुनाव के नतीजों से ही नहीं, राजनीतिक दलों की भूमिका से भी प्रदेश के भावी सियासी समीकरणों की दिशा और दशा का अनुमान लगेगा। साथ ही लोकसभा चुनाव में बनने और बिगड़ने वाले समीकरणों के भी संकेत मिलेंगे।
वैसे तो विधानसभा की एक सीट के उपचुनाव के रूप में सियासी दलों का एक इम्तिहान चल ही रहा है, जिसके लिए बृहस्पतिवार को मतदान हुआ। इसके नतीजे भी भाजपा और विपक्ष को लेकर दूरगामी संदेश देने वाले होंगे। पर, लोकसभा की दो सीटों का होने वाला उपचुनाव कई कारणों से विशिष्ट है।
दरअसल, लोकसभा की गोरखपुर और फूलपुर सीटों पर उपचुनाव मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के त्यागपत्र देने के कारण होने हैं। इसलिए इनके नतीजों के खास मायने हैं। ये नतीजे प्रत्याशियों की जीत-हार से ज्यादा इन दोनों नेताओं की पकड़ व पहुंच बताने के साथ ही पक्ष-विपक्ष सभी के लिए आगे के कुछ संदेश देने वाले भी होंगे। पता चलेगा कि प्रदेश की राजनीतिक हवा का रुख किधर है। लोकसभा के आम चुनाव में यूपी में लड़ाई भाजपा बनाम किसी गठबंधन से होनी है या विपक्ष अलग-अलग ही रहेगा।
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यह है वजह
बीजेपी
वैसे तो सिकंदरा उपचुनाव में सपा और कांग्रेस अलग-अलग ही चुनाव लड़े। इससे साफ हो गया है कि विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस और सपा की राह अलग हो गई है। बसपा लंबे समय से प्रदेश में उपचुनाव से दूर रहती है। इस बार भी वह दूर है। इसलिए यह आकलन तो अभी नहीं किया जा सकता कि लोकसभा के आम चुनाव में इस पार्टी का क्या भूमिका होगी। वह भाजपा विरोधी गठबंधन में शामिल होगी या अकेले लडे़गी।
पर, जहां तक कांग्रेस और सपा की बात है तो सिकंदरा से फिलहाल यही पता चल रहा है कि भविष्य में गठबंधन की संभावनाओं को लेकर अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। ऐसे में लोकसभा उपचुनाव में सबसे ज्यादा दिलचस्प देखना यह होगा कि गोरखपुर और फूलपुर में सपा और कांग्रेस में कौन किस पर भारी रहती है। यही नहीं, राहुल गांधी के औपचारिक रूप से राष्ट्रीय अध्यक्ष की कमान संभालने के बाद उत्तर प्रदेश में हो रहे ये उपचुनाव उनके नेतृत्व क्षमता की उनके ही घर में पहली परीक्षा होंगे। यह देखना दिलचस्प होगा कि राहुल उपचुनाव को किस रूप में लेते हैं। इसी से लोकसभा के 2019 में होने वाले आम चुनाव की उनकी रणनीति का संकेत मिलेगा।
कारण यह भी
akhilesh mayawati rahul
- फोटो : अमर उजाला
फूलपुर राहुल के परनाना जवाहर लाल नेहरू की भी सीट रही है। बात दीगर है कि लगभग तीन दशक से यहां कांग्रेस लोकसभा का चुनाव नहीं जीत पाई है। पर, अगर राहुल यहां अपनी पार्टी का प्रदर्शन भी बेहतर करा ले जाते हैं तो उनके लिए बड़ी सफलता होगी। इसी तरह गोरखपुर सीट के उपचुनाव को लेकर पता चलेगा कि गुजरात के बाद राहुल अपने गृह प्रदेश में भाजपा से अपने दम पर लड़ने को तैयार हैं या नहीं।
जहां तक भाजपा का सवाल है तो लोकसभा की गोरखपुर सीट के मतदाता मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनसे पहले उनके गुरु महंत अवेद्यनाथ को चुनकर भेजते रहे हैं। उपचुनाव के रूप में यह पहला मौका होगा जब गोरक्ष पीठ का महंत या उत्तराधिकारी नहीं लड़ेगा। कारण, योगी मुख्यमंत्री होने के साथ अब भी पीठ के महंत हैं और उन्होंने अभी तक अपना कोई उत्तराधिकारी घोषित नहीं किया है। ऐसे में यह देखने वाला होगा कि इन दोनों सीटों पर भाजपा के पक्ष में पड़ने वाले वोट 2014 के आसपास ही रहते हैं या उसमें कोई कमी आती है।
अगर कमी होती है तो विपक्ष को भाजपा पर हमला बोलने का मौका मिलेगा। इसी तरह सपा को मिलने वाले वोट भी उसके भविष्य का संकेत देंगे। साथ ही यह तय करेंगे कि गठबंधन की स्थिति में कौन किस पर भारी पड़ेगा।