कतारों की शक्ति
सुबह से लेकर शाम तक बूथों के बाहर दिखी लंबी कतारें किसी एक दल की नहीं, बल्कि बदलते बिहार की सशक्त तस्वीर थीं। महिलाओं ने पुरुषों से ज्यादा मतदान किया। कई जगह तो अंतर पांच से सात प्रतिशत तक पहुंचा। यह कोई आकस्मिक प्रवृत्ति नहीं, बल्कि राजनीतिक चेतना का प्रमाण है। पिछले दो चुनावों में भी यह रुझान दिखा था, लेकिन इस बार महिला मतदाता स्पष्ट रूप से निर्णायक भूमिका में आ गईं।
नीतीश कुमार की मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना
35% आरक्षण और स्वयं सहायता समूहों के नेटवर्क ने सुरक्षा और सम्मान का भाव दिया। दूसरी ओर, तेजस्वी यादव ने माई-बहन-मान योजना, 2,500 रुपये प्रति माह और उच्च शिक्षा में सब्सिडी जैसे वादों के जरिये सीधे आर्थिक लाभ का कार्ड खेला। इन दोनों ध्रुवों के बीच महिला मतदाता अब खुद को लाभार्थी से ज्यादा निर्णायक मान रही हैं। ग्रामीण बिहार में सुरक्षा, रोज़गार और सम्मान जैसे मुद्दों ने इस वर्ग को जाति-आधारित वोटिंग से बाहर निकालकर, विकास और भरोसे पर टिके नए समीकरणों पर मतदान करने के लिए प्रेरित किया है।
जातीय मिथक टूट रहे
पहले चरण की वोटिंग का दूसरा सबसे बड़ा संकेत पारंपरिक जातीय गोलबंदियों का टूटना है। यह मिथक अब टूट रहा है कि बिहार का मतदाता जाति के आधार पर सीमेंटेड सेगमेंट में बंटा है। आस्था अब सिर्फ पार्टी तक नहीं रही, बल्कि क्षेत्रीय सामाजिक समीकरणों और उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़ के हिसाब से वोटिंग हुई। इसका सबसे बड़ा उदाहरण तेजस्वी यादव की अपनी राघोपुर सीट है। यादव-बहुल क्षेत्र में भी भाजपा प्रत्याशी सतीश यादव को अप्रत्याशित समर्थन मिला।
- यह उस जातीय सीमेंट में दरार का प्रतीक है जो दशकों से राजनीति की नींव मानी जाती रही। इसी तरह मोकामा में भूमिहार बनाम यादव की क्लासिक लड़ाई इस बार उलट गई, जहां बाहुबली प्रभाव और स्थानीय वफादारियों ने जाति की रेखा को पीछे छोड़ दिया।
- ईबीसी (अति पिछड़ा वर्ग) में भी दिलचस्प हलचल दिखी है, कुशवाहा, मल्लाह और धानुक वोट कई जगहों पर दोनों ओर बंट गए। यह संकेत है कि वोट अब सिर्फ जाति का नहीं रहा, बल्कि समीकरण का है।