पटना हाईकोर्ट ने बिहार में जाति सर्वेक्षण पर चार मई को अस्थायी रोक लगा दी थी। इसके बाद हाईकोर्ट ने एक अगस्त को बिहार सरकार द्वारा कराए जा रहे जाति सर्वेक्षण को वैध और कानूनी ठहराया। अदालत ने उन याचिकाओं को भी खारिज कर दिया जो जून 2022 में राज्य सरकार द्वारा शुरू किए गए जाति सर्वेक्षण के खिलाफ दायर की गई थीं।
सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में जातीय सर्वेक्षण को हरी झंडी देने के पटना हाई कोर्ट के एक अगस्त के आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने सोमवार को इस फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई 14 अगस्त तक के लिए टाल दी।
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जस्टिस संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति एसवीएन भट्टी की पीठ ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) ‘एक सोच एक प्रयास’ की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई की। उनकी ओर से पेश वरिष्ठ वकील सीएस वैद्यनाथन ने यह कहते हुए मामले की सुनवाई स्थगित करने का अनुरोध किया कि इसी मुद्दे पर सुनवाई वाली अन्य याचिकाएं सूचीबद्ध नहीं हैं।
उन्होंने पीठ से मामले की सुनवाई 11 अगस्त या 14 अगस्त को करने का अनुरोध किया। वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने भी मामले की सुनवाई 14 अगस्त को करने का अनुरोध किया। इस पर पीठ ने सहमति जताई। अपीलकर्ता की तरफ से उपस्थित एक अन्य वकील ने पीठ से हाईकोर्ट के फैसले से पहले की यथास्थिति बनाए रखने का आदेश देने का आग्रह किया।
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इस पर शीर्ष कोर्ट ने कहा कि कौन सी यथास्थिति? हमने इस मामले में नोटिस भी जारी नहीं किया है। हमने इस मुद्दे पर आपको सुना भी नहीं है। आप वास्तव में अपनी बात कर रहे हैं। फिलहाल मामले में यथास्थिति का कोई सवाल ही नहीं है। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि गणना से संबंधित 80 फीसदी काम पूरा हो चुका है।
एनजीओ ‘एक सोच एक प्रयास’ की याचिका के अलावा एक अन्य याचिका नालंदा निवासी अखिलेश कुमार ने दायर की है। इसमें दलील दी गई है कि इस कवायद के लिए राज्य सरकार की अधिसूचना संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ है। संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार केवल केंद्र सरकार ही जनगणना कराने का अधिकार रखती है।
गौरतलब है कि पटना हाईकोर्ट ने बिहार में जाति सर्वेक्षण पर चार मई को अस्थायी रोक लगा दी थी। इसके बाद राज्य सरकार ने कहा था कि जाति-आधारित डेटा का संग्रह संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 के तहत एक संवैधानिक आदेश है। इसके बाद हाईकोर्ट ने एक अगस्त को बिहार सरकार द्वारा कराए जा रहे जाति सर्वेक्षण को वैध और कानूनी ठहराया। अदालत ने उन याचिकाओं को भी खारिज कर दिया जो जून 2022 में राज्य सरकार द्वारा शुरू किए गए जाति सर्वेक्षण के खिलाफ दायर की गई थीं।