न्यायमूर्ति चौधरी ने कहा कि 1975 के आपातकाल के दौरान कार्यपालिका ने विभिन्न उच्च न्यायालयों के 16 न्यायाधीशों का तबादला किया था और 48 साल बाद कॉलेजियम ने 24 न्यायाधीशों का तबादला किया है। वह सोमवार को अपने विदाई समारोह में बोल रहे थे, जहां कलकत्ता उच्च न्यायालय की पीठ के सदस्य मौजूद थे।
उन्होंने कहा कि वह कार्यपालिका के हाथों से न्यायपालिका की सर्वोच्च सीट के शक्ति के हस्तांतरण के बदलाव के शुरुआती लोगों में से एक हैं। उन्होंने कहा कि 28 जनवरी, 1983 को केंद्र ने फैसला किया था कि उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश राज्य के बाहर से होंगे और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों में एक तिहाई राज्य के बाहर से होने चाहिए। न्यायमूर्ति चौधरी ने कहा, 'मुझे लगता है कि हमारा तबादला उस नीति को लागू करने की शुरुआत थी।'
उन्होंने आगे कहा कि यह कॉलेजियम की इच्छा थी कि उनका तबादला पटना उच्च न्यायालय में हो। न्यायमूर्ति चौधरी ने कहा कि जब उन्हें उच्च न्यायपालिका में पदोन्नत किया गया था, तो वह जानते थे कि संविधान में अनुच्छेद 222 के तहत एक प्रावधान है कि कैसे एक न्यायाधीश का तबादला किया जा सकता है। उन्होंने कहा, 'मैं पूरी विनम्रता से कहूंगा कि न्यायिक फैसले में अनुच्छेद 222 का ध्यान रखा जाना चाहिए। इस पर बहुत संयम से विचार किया जाना चाहिए।' संविधान का अनुच्छेद 222 मुख्य न्यायाधीश समेत न्यायाधीशों के एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में तबादले का प्रावधान करता है।
न्यायमूर्ति चौधरी ने कहा कि 24 नवंबर को पटना उच्च न्यायालय में कार्यभार संभालने के तुरंत बाद उन्हें अपने परिवार के लिए व्यवस्था करने के लिए चार दिन की छुट्टी लेनी होगी। उन्होंने आगे कहा, इसलिए मैं उन दिनों (एक न्यायाधीश के रूप में) अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं कर पाऊंगा।