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भोपाल गैस कांड : राज ही बना रहा यूका चेयरमैन एंडरसन का भागना, पथराई आंखों से आज भी इंसाफ का इंतजार 

Sun, 02 Dec 2018 04:46 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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वारेन एंडरसन (फाइल फोटो) - फोटो : social media
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दो-तीन दिसंबर, 1984 की दरम्यानी रात को मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के जेपी नगर में कुछ ऐसा हुआ, जिसने पूरी दुनिया का झकझोर के रख दिया था। इस रात को यहां स्थित यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड के प्लांट से जहरीली गैस (मिथाइल आइसोसाइनाइट) का रिसाव हुआ, जिससे पूरे शहर में कोहराम मच गया।

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इस हादसे में कितने लोगों की जान गई और कितने प्रभावित हुए इसका आंकड़ा आज भी सही से पता नहीं चल सका है। 3 दिसंबर 1984 की सुबह पूरे शहर में हर तरफ चीख पुकार की सुनाई दे रही थी। भोपाल गैस त्रासदी की 34वीं बरसी पर एक बार फिर लोगों के जेहन में यूनियन कार्बाइड कारखाने के मालिक वारेन एंडरसन की यादें ताजा कर दी हैं।

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यूनियन कार्बाइड कारखाने की जहरीली गैस से ही मौतों के मामलों और बरती गई लापरवाहियों के लिए यूनियन कार्बाइड फैक्टरी के मालिक वारेन एंडरसन को मुख्य आरोपी बनाया गया था। वारेन एंडरसन को भारतीय दंड विधान (आईपीसी) की ऐसी गंभीर धाराओं के तहत गिरफ्तार तो किया गया, जिन पर अदालत की इजाजत के बिना जमानत नहीं मिल सकती थी।

लेकिन महज चार-पांच घंटे के भीतर इन्हें न सिर्फ जमानत मिल गई, बल्कि इनके लिए भोपाल से तो क्या देश से भागने का इंतजाम कर दिया गया। इसके बाद इनके खिलाफ अदालतों में सुनवाइयां होती रहीं, अमेरिका से इनके प्रत्यर्पण की कथित कोशिशें भी की जाती रहीं, लेकन ये कभी भारत नहीं लौटे। एंडरसन 1986 में यूनियन कार्बाइड के सर्वोच्च पद से रिटायर हुए और 92 साल की उम्र में 29 सितंबर 2014 को अमेरिका के फ्लोरिडा में इनकी मौत हो गई।

पीड़ित एंडरसन को भारत लाकर सजा देने की मांग करते रहे, लेकिन भारत सरकार उसे अमेरीका से नहीं ला सकी। हजारों लोग अपना हक न मिलने से दुखी हैं, उन्हें अफसोस इस बात का भी है कि तीन दशकों में कितनी सरकारें आईं, मगर कोई सरकार यह भी पता नहीं लगा पाई कि वारेन एंडरसन की रिहाई किसके कहने पर हुई थी।

माना जाता है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने वारेन एंडरसन को विशेष विमान से भोपाल से निकलने की सुविधा उपलब्ध करवाई थी। हालांकि, एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि उस समय की केंद्र सरकार से आदेश मिलने के बाद वारेन को भोपाल से बाहर जाने दिया गया।  

किताबों में दर्ज है कैसे भागा था वारेन एंडरसन

- फोटो : फाइल फोटो
डॉन कर्जमैन की लिखी किताब 'किलिंग विंड' के मुताबिक, एंडरसन अपने अन्य सहयोगियों के साथ 7 दिसंबर को सुबह साढ़े नौ बजे इंडियन एयरलाइंस के विमान से भोपाल पहुंचता है, हवाई अड्डे पर तत्कालीन पुलिस अधीक्षक स्वराज पुरी और जिलाधिकारी मोती सिंह मौजूद रहते हैं। दोनों एंडरसन को एक सफेद एंबेस्डर कार में कार्बाइड के रेस्ट हाउस ले जाते हैं और वहीं उन्हें हिरासत में लिए जाने की जानकारी देते हैं।

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कर्जमैन आगे लिखते हैं कि दोपहर साढ़े तीन बजे एंडरसन को पुलिस अधिकारी द्वारा बताया जाता है, 'हमने आपको भोपाल से दिल्ली जाने के लिए राज्य सरकार के विशेष विमान की व्यवस्था की है, जहां से आप अमेरिका लौट सकते हैं।' कुछ जरूरी कागजात पर दस्तखत करने के बाद एंडरसन दिल्ली के लिए उड़ गया। हजारों इंसान का 'कातिल' फिर कभी भोपाल नहीं आया, वहीं से उसे अमेरिका भेज दिया गया।

गैस कांड के वक्त भोपाल के कलेक्टर रहे मोती सिंह ने अपनी किताब 'भोपाल गैस त्रासदी का सच' में बताया है कि उन्होंने और तत्कालीन एसपी स्वराज पुरी ने कैसे वारेन एंडरसन को भागने में मदद की थी। यह किताब 2009 में आई थी। इसमें इन्होंने 1984 के उस वाकये का विस्तार से जिक्र किया है। 
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आज भी अपने यहां जहरीले कचरे के निस्तारण की नहीं है कोई तकनीक

- फोटो : social media
आज भी भोपाल में यूनियन कार्बाइड कारखाने के आस-पास जहरीली गैसों का खतरा बरकरार है। उस त्रासदी का 346 टन जहरीला कचरा निस्तारण अब भी एक चुनौती बना हुआ है। ये कचरा आज भी हादसे की वजह बने यूनियन कार्बाइड कारखाने में कवर्ड शेड में मौजूद है। इसके खतरे को देखते हुए यहां पर आम लोगों का प्रवेश अब भी वर्जित है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर कारखाने के 10 टन कचरे का निस्तारण इंदौर के पास पीथमपुर में किया गया था, लेकिन इसका पर्यावरण पर क्या असर पड़ा ये अब भी पहेली बना हुआ है। दरअसल विडंबना तो ये है कि भारत के पास इस जहरीले कचरे के निस्तारण की तकनीक और विशेषज्ञ आज भी मौजूद नहीं हैं।

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बहरहाल, भोपाल गैस कांड के पीड़ित सरकारी और प्रशासनिक अवहेलना के दंश को झेलने को मजबूर हैं। इनका संघर्ष कब तक जारी रहता है और क्या इन्हें इंसाफ मिल पाता है या नहीं, यह तो समय ही बताएगा। 

अंग्रेजी के सुरक्षा मैन्युअल ने बिगाड़ा खेल

हादसे के बाद जांच एजेंसियों को पता चला कि कारखाने से संबंधित सभी सुरक्षा मैन्युअल अंग्रेजी में थे। इसके विपरीत कारखाने के ज्यादातर कर्मचारियों को अंग्रेजी का कोई ज्ञान नहीं था। संभवतः उन्हें आपात स्थिति से निपटने के लिए जरूरी प्रशिक्षण भी नहीं दिया गया था। जानकारों के अनुसार अगर लोग मुंह पर गीला कपड़ा डाल लेते तो भी जहरीली गैस का असर काफी कम होता, लेकिन किसी को इसकी जानकारी ही नहीं थी। इस वजह से हादसा इतना बड़ा हो गया।
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