एक जनवरी को हुई भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में पुणे पुलिस यलगार परिषद की भूमिका की जांच कर रही है। सेशंस कोर्ट से पुलिस को चार्जशीट दाखिल करने के लिए 90 दिनों का समय मिल गया है। पुलिस ने हिंसा के पांच आरोपियों- रोनी विल्सन, सुधीर धावले, सुरेंद्र गाडलिंग, शोमा सेन और महेश राउत के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने के लिए 90 दिनों की मोहलत मांगी थी। जिसे कि कोर्ट में मंजूर कर लिया।
वहीं मामले के दो आरोपी शोमा सेन और सुरेंद्र गाडलिंग ने कोर्ट में जमानत के लिए याचिका दाखिल की है जिसपर 6 सितंबर को सुनवाई होगी। पिछले हफ्ते मंगलवार को पुणे पुलिस ने कई जगहों पर छापेमारी करके पांच वामपंथी विचारकों को गिरफ्तार किया था। जिसमें वारा वारा राव, गौतम नवलखा, अरुण फरेरा, सुधा भारद्वाज और वेरनोन गोंसाल्विस शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने इन विचारकों की गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए इन्हें घर में नजरबंद कर रखने का आदेश दिया था।
मुख्य न्यायधीश जस्टिस दीपक मिश्रा की बेंच ने मशहूर इतिहासकार रोमिला थापर और चार अन्य लोगों की याचिका पर सुनवाई करते हुए समाजिक कार्यकर्ताओं को बड़ी राहत दी थी। इससे पहले महाराष्ट्र पुलिस ने आरोपियों के पास से मिले कुछ पत्रों को सार्वजनिक करते हुए कहा था कि इन पत्रों से साबित होता है कि आरोपी प्रतिबंधित माओवादी संगठन के संपर्क में थे और वर्तमान सरकार को अस्थिर करना चाहते थे।
महाराष्ट्र पुलिस के एडीजी परमबीर सिंह ने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा था कि इन कार्यकर्ताओ के माओवादियों से संबंध होने को लेकर पुलिस आश्वस्त है। बता दें कि एक जनवरी को पुणे के नजदीक
भीमा-कोरेगांव युद्ध के 200 साल पूरा होने के मौके पर आयोजित कार्यक्रम के दौरान दो समूहों के बीच संघर्ष हो गया था। इस संघर्ष में एक युवक की मौत हो गई थी जबकि चार लोग घायल हो गए थे।