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स्वामी प्रसाद मौर्या के मामले में जल्दबाजी नहीं दिखाना चाहती BJP

Sun, 26 Jun 2016 08:08 AM IST
राघवेंद्र नारायण मिश्र/ अमर उजाला, नई दिल्ली
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भाजपा नेताओं से गोपनीय मुलाकातों की चर्चा के बीच बसपा के पूर्व नेता स्वामी प्रसाद मौर्या की रणनीति अब अलग नई पार्टी बनाने की ओर केंद्रित हो रही है। भाजपा भी इस मामले में जल्दीबाजी नहीं दिखाना चाहती है। मौर्या पहले मायावती विरोधी पूर्व बसपाइयों को एकजुट करना चाहते हैं। इसमें सफलता के बाद ही उनका अगला कदम तय होगा। सपा से दोस्ती होने से पहले ही बात बिगड़ गई है। वैसे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अब भी मौर्या को पार्टी में लाने के पक्ष में हैं।
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मौर्या की दिल्ली यात्रा एक समाचार चैनल के कार्यक्रम से बहाने हुई। भाजपा सूत्रों के मुताबिक बसपा छोडने से पहले ही मौर्या और भाजपा के नेताओं की बातचीत चलती रही है। मौर्या उत्तर प्रदेश में जनाधार वाले नेता माने जाते रहे हैं। मौर्य समाज में उनकी पकड़ भी अच्छी रही है।

वैसे पुराना इतिहास बताता है कि बसपा छोडने के बाद अबतक किसी नेता को नई पार्टी बनाने पर ज्यादा समर्थन नहीं मिल पाया है। मौर्या के समक्ष इस मान्यता को तोडने की चुनौती है।
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भाजपा में मौर्या के मुद्दे पर अलग-अलग राय है। भाजपा ने उत्तर प्रदेश की जंग में फतह के लिए हर जरूरी दावपेंच इस्तेमाल करने की रणनीति बनाई है। भाजपा आलाकमान को पता है कि उत्तर प्रदेश में उनकी लड़ाई बसपा से ही होने वाली है। लिहाजा बसपा के वोट बैंक में सेंध पहली जरुरत है।इसी रणनीति के तहत केशव प्रसाद मौर्या को प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर बिठाया गया है।
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भाजपा के लिए सकारात्मक संदेश

अब अगर स्वामी मौर्या भी भाजपा में आ जाते हैं तो इससे ओबीसी वोट बैंक में भाजपा के लिए सकारात्मक संदेश जा सकता है। लेकिन भाजपा में कुछ नेता मानते हैं कि अगर स्वामी मौर्या अलग पार्टी बनाकर मैदान में आते हैं तो बसपा के वोट बैंक में सेंध लगाई जा सकती है। इस नई पार्टी को भले ही भारी सफलता नहीं मिले लेकिन कई सीटों पर बसपा के लिए मुशिकलें जरूर कड़ी हो सकती हैं।

बसपा के वोट बैंक में सेंध के संदेश से मुस्लिम वोट बैंक का ध्रुवीकरण को रोका जा सकता है। मौर्या के समर्थकों को लगता है कि चुनाव से पहले भाजपा के साथ जाने पर उनका वजूद सीमित हो सकता है।

उधर भाजपा के रणनीतिकार मान रहे हैं कि भाजपा से अलग रहकर नई पार्टी के जरिए स्वामी मौर्या कई सीटों पर मुसिलम वोट को भी आकर्षित कर सकते हैं। यह स्थिति भी भाजपा के लिए फायदेमंद होगी।

बसपा छोडने या पार्टी से निकाले जाने वाले अधिकांश नेता मौर्या पर अलग पार्टी बनाने के लिए ही दबाव बना रहे हैं। एक जुलाई की बैठक के बाद स्वामी मौर्या इसका एलान कर सकते हैं। चुनाव में भाजपा से दोस्ताना संघर्ष और चुनाव बाद समझौते के लिए आपसी समझ पहले विकसित की जा सकती है।

Published By Rahul Sankrityayan
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