भाजपा नेताओं से गोपनीय मुलाकातों की चर्चा के बीच बसपा के पूर्व नेता स्वामी प्रसाद मौर्या की रणनीति अब अलग नई पार्टी बनाने की ओर केंद्रित हो रही है। भाजपा भी इस मामले में जल्दीबाजी नहीं दिखाना चाहती है। मौर्या पहले मायावती विरोधी पूर्व बसपाइयों को एकजुट करना चाहते हैं। इसमें सफलता के बाद ही उनका अगला कदम तय होगा। सपा से दोस्ती होने से पहले ही बात बिगड़ गई है। वैसे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अब भी मौर्या को पार्टी में लाने के पक्ष में हैं।
मौर्या की दिल्ली यात्रा एक समाचार चैनल के कार्यक्रम से बहाने हुई। भाजपा सूत्रों के मुताबिक बसपा छोडने से पहले ही मौर्या और भाजपा के नेताओं की बातचीत चलती रही है। मौर्या उत्तर प्रदेश में जनाधार वाले नेता माने जाते रहे हैं। मौर्य समाज में उनकी पकड़ भी अच्छी रही है।
वैसे पुराना इतिहास बताता है कि बसपा छोडने के बाद अबतक किसी नेता को नई पार्टी बनाने पर ज्यादा समर्थन नहीं मिल पाया है। मौर्या के समक्ष इस मान्यता को तोडने की चुनौती है।
भाजपा में मौर्या के मुद्दे पर अलग-अलग राय है। भाजपा ने उत्तर प्रदेश की जंग में फतह के लिए हर जरूरी दावपेंच इस्तेमाल करने की रणनीति बनाई है। भाजपा आलाकमान को पता है कि उत्तर प्रदेश में उनकी लड़ाई बसपा से ही होने वाली है। लिहाजा बसपा के वोट बैंक में सेंध पहली जरुरत है।इसी रणनीति के तहत केशव प्रसाद मौर्या को प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर बिठाया गया है।